बेटी के मुकाबले बेटों को हीमोफीलिया का खतरा ज्यादा
हीमोफीलिया एक गंभीर आनुवांशिक बीमारी है जो मुख्यतः बेटों में होती है। लखनऊ में लगभग 1200 मरीज हैं। समय पर खून चढ़ाने से मरीज सामान्य जीवन जी सकते हैं। बीमारी के लक्षणों में मामूली चोटों पर लंबे समय तक खून बहना शामिल है। जागरूकता और नियमित इलाज की आवश्यकता है।

हीमोफीलिया दिवस आज समय पर खून चढ़ाकर हीमोफीलिया जैसी गंभीर आनुवांशिक बीमारी से मरीजों का जीवन सुरक्षित किया जा सकता है80 प्रतिशत बेटों और 20 फीसदी बेटियों में होती है यह बीमारीलखनऊ, रजनीश रस्तोगीशरीर से खून बहना अगर घंटों तक न रुके तो इसे सामान्य चोट समझने की भूल भारी पड़ सकती है। यह संकेत हो सकता है हीमोफीलिया जैसी गंभीर आनुवांशिक बीमारी का। यह बीमारी बेटों में ज्यादा पाई जाती है। तकरीबन 80 प्रतिशत मरीज पुरुष होते हैं। जबकि बेटियों में हीमोफीलिया करीब 20 फीसदी होता है।लखनऊ में करीब 1200 मरीज हीमोफीलिया की चपेट में हैं। यह बीमारी एक लाख में एक बच्चे को हो सकती है।
यह बीमारी बच्चे को विरासत में मिलती है। केजीएमयू ब्लड एंड ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन विभाग की अध्यक्ष डॉ. तूलिका चन्द्रा ने बताया कि हीमोफीलिया एक ऐसी स्थिति है जिसमें खून का थक्का जमाने वाले प्रोटीन (क्लॉटिंग फैक्टर) की कमी होती है। नतीजतन मामूली चोट भी लंबे समय तक खून बहने का कारण बन जाती है। कई मामलों में बिना किसी बाहरी चोट के भी शरीर के अंदरूनी हिस्सों जोड़ों और मांसपेशियों में खून बहने लगता है। जो स्थायी विकलांगता तक का कारण बन सकता है।यहां इलाज की सुविधापीजीआई, केजीएमयू और लोहिया संस्थान में इस बीमारी के इलाज की सुविधा उपलब्ध है। यहां दवा के साथ मरीज को खून या फैक्टर चढ़ाएं जाते हैं। अगर समय पर सही इलाज मिले, खासकर जरूरत के अनुसार खून या क्लॉटिंग फैक्टर चढ़ाया जाए, तो मरीज सामान्य जीवन जी सकता है। लेकिन जागरूकता की कमी और इलाज में देरी मरीजों के लिए गंभीर खतरा बन रही है।बेटों में ज्यादा खतराडॉ. तूलिका ने बताया कि हीमोफीलिया एक्स-क्रोमोसोम से जुड़ी बीमारी है। चूंकि बेटों में एक ही एक्स-क्रोमोसोम होता है। इसलिए दोषपूर्ण जीन सीधे बीमारी के रूप में सामने आ जाता है। वहीं लड़कियों में दो एक्स-क्रोमोसोम होने के कारण एक स्वस्थ जीन बीमारी के प्रभाव को कम कर देता है। जिससे उनमें लक्षण कम या हल्के होते हैं। हीमोफीलिया लाइलाज जरूर है पर समय पर इलाज से बीमारी काबू में रखी जा सकती है। जरूरत है समय पर पहचान, नियमित इलाज और जागरूकता की।लक्षणमामूली चोट पर भी लंबे समय तक खून बहनाबार-बार नाक से खून आनादांत निकलने या सर्जरी के बाद खून न रुकनाजोड़ों (घुटने, कोहनी) में सूजन और दर्दबिना चोट के शरीर में नीले-लाल निशान पड़नागंभीर मामलों में पेशाब या मल में खून आनाबचाव और सावधानियांपरिवार में इतिहास हो तो बच्चे की समय रहते जांच कराएंचोट लगने से बचाव के लिए सतर्क जीवनशैली अपनाएंडॉक्टर की सलाह के बिना कोई दवा न लें, खासकर खून को पतला करने वाली दवाएंनियमित फॉलोअप और क्लॉटिंग फैक्टर थेरेपी कराते रहेंस्कूल और परिवार में जागरूकता बढ़ाएं ताकि आपात स्थिति में सही कदम उठाया जा सके।
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