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विपुलम सम्मान

डॉ. कुंअर बेचैन को दिया गया 'विपुलम सम्मान'

-आगरा की डॉ. रुचि चतुर्वेदी को 'विपुलम विदुषी' व प्रयागराज के डॉ. श्लेष गौतम को 'विपुलम युवा सम्मान' से नवाजा गया

लखनऊ। वरिष्ठ संवाददाता

देश के जानेमाने कवि, गीतकार डॉ. कुंअर बेचैन को इस वर्ष का 'विपुलम सम्मान' दिया गया है। शनिवार को गोमतीनगर स्थित विपुलम पार्क में आयोजित समारोह में विपुलम संस्था ने उन्हें इस सम्मान से नवाजा। वर्ष 2004 से यह संस्था देश के नामचीम कवियों को सम्मानित करती आ रही है।

डॉ. बेचैन के अलावा आगरा की डॉ. रुचि चतुर्वेदी को 'विपुलम विदुषी' व प्रयागराज के डॉ. श्लेष गौतम को 'विपुलम युवा सम्मान' दिया गया। कैबिनेट मंत्री बृजेश पाठक यहां बतौर मुख्य अतिथि मौजूद थे। बता दें कि इससे पूर्व सूर्य कुमार पांडेय, गोपालदास नीरज, असरानी, हरिओम पंवार, सुरेन्द्र शर्मा, ओम प्रकाश आदित्य, संतोष आनंद, माणिक वर्मा, प्रदीप चौबे, डॉ. उदय प्रताप सिंह, डॉ. विष्णु सक्सेना, सोम ठाकुर और अशोक चक्रधर को यह सम्मान दिया जा चुका है। शनिवार को आयोजित मुख्य समारोह के बाद यहां कवि सम्मेलन भी आयोजित किया गया जिसमें अभय सिंह निर्भीक, क्षितिज उमेन्द्र, हेमंत पांडेय, सबा बलरामपुरी और सर्वेश अस्थाना ने काव्यपाठ किया।

अब कवियों को कुछ साबित नहीं करना है: डॉ. कुंअर बेचैन

कविता के मंच पर लगभग 60 वर्षों का सफर तय कर चुके डॉ. कुंअर बेचैन अब उन सृजनकारों की सफ में खड़े होते हैं जिनकी मौजूदगी भर मंच को बड़ा बना देती है। मगर वो कहते हैं न कि 'खुद से चलकर नहीं ये तर्ज-ए-सुखन आया है, पांव दाबे हैं बुजुर्गों के तो फन आया है...'। मकबूल शायर मुनव्वर राना की यह बात उनके और डॉ. कुंअर बेचैन जैसे हर स्थापित रचनाकार के लिए कही जाए तो गलत नहीं होगी। 'विपुलम सम्मान' ग्रहण करने लखनऊ आए डॉ. कुंअर बेचैन ने 'हिन्दुस्तान' से बातचीत में अपने 6 दशक के सफर के बारे में ढेरों बातें साझा कीं...।

सोशल मीडिया ने आसान बनाई राह: इस लम्बे अरसे में आए बदलाव पर बेचैन कहते हैं कि पहले मंच तक पहुंचने के लिए कवि को खुद को साबित करना होता था। विशेषज्ञ आपना विश्लेषण करने के लिए बैठे होते थे मगर अब सोशल मीडिया ने मानक खत्म कर दिए हैं। अब किसी को कुछ साबित नहीं करना है। एक कविता लिखकर भी आप कवि बन सकते हैं। पहले दो-चार शहरों में से एक अच्छा कवि निकलता था, अब हर शहर में सैंकड़ों मौजूद हैं। लोगों ने अपने ग्रुप बना लिए हैं, खुद ही कवि सम्मेलन आयोजित करके एक-दूसरे को मंच प्रदान कर दिया जाता है। हां, एक अच्छी चीज जरूर हुई है कि कवि सम्मेलनों की संख्या में भारी बढ़ोत्तरी हुई है।

सरल-सुगम कविताओं का दौर है: मंचों से तरन्नुम खत्म होने पर बात करते हुए वह कहते हैं कि अब कविताओं के मानक पर नहीं सामग्री पर जोर होता है, जो कि होना भी चाहिए। नए कवि सामाजिक मुद्दों पर ज्यादा बात कर रहे हैं तो उनकी कविताएं मानक पर पूरी न भी हों लेकिन सुनने वालों को जोड़ती हैं। रही बात तरन्नुम की तो अब सरल-सुगम कविताओं का दौर है जो झट से समझ आ जाएं और यह तरन्नुम में थोड़ा कम संभव है।

तनाव, आक्रोश, गतिशीलता हावी: डॉ. बेचैन कहते हैं कि अब मंचों पर तीन तरह के कवि सुने जा रहे हैं। पहले वो जो तनावग्रस्त व्यक्ति को हंसी-ठहाके दे सकें, फिर वह भले ही कविता की जगह चुटकुले सुनाए। दूसरे वो जो जनता के आक्रोश को अपनी कलम में उतार सकें और तीसरे वो जो बिना गहरे में उतरे लिखें और सुनने वालों को भी बिना समय गंवाए सब समझ आ जाए। बाकी कवि बनने, कविता लिखने के लिए जो सबसे जरूरी चीज है, वह है संवदेना और अब यही गायब हो रही है।

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