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इन युवाओं ने सुविधाओं के अभाव में जंगल के बीच सीखा करतब, बढ़ाया देश का मान-VIDEO

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लखनऊ के मोहान रोड पर सरोसा गांव के भीतर बबूल व बेहया के पेड़ों का जंगल।  इस निर्जीव जंगल में करीब आधा किलोमीटर भीतर घुसने पर ‘हू...हा’,‘हू...हा’ की आवाजें आ रही थीं। थोड़ा आगे बढ़ने पर जो नजारा दिखा वह हैरतअंगेज था। करीब 15-20 लड़के ऐसे-ऐसे करतब दिखा रहे थे कि दांतों तले उंगलियां दब गईं। ऐसे समरसाल्ट कर रहे थे कि जिमनास्ट भी उनके फीके थे। हाथों के बल ऐसे चल रहे थे जैसे पैरों से चलते हैं। गड्डे में बैक डिप्स लगा रहे थे। बांस व बल्लियों से पैरलर बार बना रखी थी। जिमनास्टिक में वाल्टिंग टेबल पर समरसाल्ट करने के लिए स्प्रिंग बोर्ड होता है पर ये लड़के इसके लिए बस के खराब टायर का इस्तेमाल करते हैं।

वीडियो- विनय पांडेय और अनंत मिश्र

इन लड़कों की उम्र सात साल से लेकर 25 साल तक है। ये सभी सरोसा के अलावा भरोसा, बुद्धेश्वर, नरौना, काकोरी, फतेह खेड़ा आदि गांवों के हैं। सरोसा गांव के सोनू रावत को जिमनास्टिक का शौक था। वह इलाहाबाद के जिमनास्टिक सेंटर ट्रेनिंग करने गए। पर वहां की फीस बहुत ज्यादा था ऐसे में वह मायूस होकर लौट आए और गांव में ही ट्रेनिंग करने लगे। उन्हें देखकर गांव के अन्य लड़के भी आने लगे। जब भीड़ बढ़ने लगी तो सोनू ने जंगल के भीतर अपना सेंटर बना लिया। इतने पैसे नहीं थे कि ट्रेनिंग के लिए उपकरण खरीद सकें। ऐसे में उन्होंने आसपास की चीजों को इकट्ठा कर जुगाड़ से उपकरण बनाए। मसलन बांस-बल्लियों से पैरलर बार बना ली। बैक डिप्स के लिए गड्ढा खोदा। गद्दे नहीं थे तो अखाड़े की तरह मिट्टी खोदकर भुरभुरी की। वेट टे्रनिंग के लिए प्लेट् व राड्स नहीं थीं तो सीमेंट को गोले बनाकर बांसों में फंसाए। किक के लिए पैड बनाए।

क्या ट्रेनिंग शेड्यूल:
हर दिन सुबह पांच से सात और शाम को पांच से सात बजे तक ट्रेनिंग होती है। सभी बच्चे इकट्ठा होते हैं। हल्की रनिंग के साथ वार्मअप करते हैं। इसके बाद इनके कोच सोनू रावत सबको निर्देश देते हैं। इसके बाद पैरलर बार पर टेक लगाकर उल्टी डिप्स लगाते हंै। फिर गड्ढे में बैक डिप्स लगाई जाती हैं। इसके बाद ताकत के लिए सभी उल्टे होकर हाथ के बल चलते हैं। फिर शुरू होती असली ट्रेनिंग यानी समरसाल्ट व किकिंग की। सभी बारी-बारी से भुरभुरी मिट्टी पर समरसाल्ट लगाते हैं।

ग्रामीण प्रतियोगिताओं में दिखाते हैं दम:
ये ग्रामीण खिलाड़ी अभी शहरी प्रतियोगिताओं से दूर हैं। ये ग्रामीण खेलों की ब्लाक व पंचायत स्तर की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेते हैं। सतीश पाल, सिद्धार्थ रावत, शिव कुमार जैसे खिलाड़ी तो एथलेटिक्स में कई पदक जीत चुके हैं। इसके अलावा गांव में वे खुद प्रतियोगिताएं कराते हैं। इसमें उनके अलावा अन्य बच्चे भी हिस्सा लेते हैं।

सब करते हैं कुछ न कुछ काम:
ये सभी लड़के कुछ न कुछ काम करते हैं। सिद्धार्थ, सतीश पाल, शिव कुमार, विनय कुमार, मोहित छत ढालने से पहले सरिया का जाल बिछाने का काम करते हैं।  अमन बारातों में जेनरेटर खींचता है। शैलेंद्र रावत बढ़ईगीरी करते हैं। बलवंत परचून की दुकान में काम करता है। ये सब बेहद गरीब परिवारों से तालुक रखते हैं। किसी के पिता तांगा चलाते हैं तो किसी के पिता मजदूरी करते हैं। इनके अलावा रंजीत व अतुल तो यहां जिमनास्टिक करके उम्दा डांसर बन गए हैं। ये स्टेज शो करते हैं। यही नहीं रंजीत व अतुल गांव के अन्य बच्चों को डांस भी सिखाते हैं।

प्रतियोगिताओं में लेंगे हिस्सा:
ये गंवईं खिलाड़ी जल्द ही अपना क्लब बनाने जा रहे हैं। इस क्लब के जरिए वे राजधानी में होने वाली जिमनास्टिक, मार्शल आर्ट और एथलेटिक्स की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेंगे। यही नहीं अगर खिलाड़ी का चयन राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में हो जाएगा तो उसके खर्च के लिए गांव से चंदा इकट्ठा किया जाएगा।

‘बच्चों को खेलों की तरफ ले जाने के पीछे दो कारण हैं। पहला तो इनके भीतर छिपी प्रतिभा सामने आएगी और दूसरा यह कि यह कुसंगति और बुरी आदतों से बचे रहेंगे। जब सभी सुबह और शाम तीन-तीन घंटे ट्रेनिंग करेंगे तो इनमें इतनी ताकत नहीं रहेगी कि ये फालतू घूमें। फिलहाल साधन कुछ नहीं हैं। गांव के  कुछ लोगों ने कहा कि वे कुछ सामान दिला देंगे। पर अभी मिला कुछ नहीं है। इसके बावजूद सभी बच्चे ट्रेनिंग करते रहते हैं।’
सोनू रावत
कोच व खिलाड़ी

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  • Web Title:These youth from lucknow learned gymnastics in jungle and played well on international platform