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यादों भरी होली : चाचा की खटिया होलिका में डाल आए... 

वरिष्ठ हास्य कवि सर्वेश अस्थाना बचपन में होली आने पर खूब मस्ती करते थे। उस समय होली महज एक दिन का त्योहार नहीं, महीने भर का उत्सव होता था। बसंत पंचमी के दिन जब होलिका की शुरुआत होती थी तो हम बच्चे रात में निकलकर पूरे गांव से लकड़ियां इकट्ठा करते और होलिका में डाल देते। यहां तक कि लोगों के घरों के बाहर पड़े स्टूल, कुर्सियां, चारपाई तक होलिका के नाम हो जाती थीं। 
इसी से जुड़ी एक घटना सर्वेश अस्थाना को अब भी याद है। वे बताते हैं कि बात है 1978 या 79 की है। हम सब टोली बनाकर रात में लकड़ी चुराने के लिए गांव में निकले थे। एक जगह एक खाली चारपाई दिखी तो हम उसे ले जाकर होलिका में डाल आए। दरअसल उस चारपाई पर जो चाचा सो रहे, वह थोड़ी देर के लिए उठकर कहीं गए थे, जब वे लौटे तो देखा कि खटिया गायब। बेचारे चाचा यह समझ नहीं पाए कि उनकी खटिया होलिका की भेंट चढ़ गयी। चारपाई गायब होने से वे काफी डर गए थे। वे डर के मारे चिल्लाने लगे कि गांव में भूत है। सर्वेश अस्थाना बताते हैं कि अब इस तरह का आनन्द होली में नहीं रह गया है। 

दो दिन चलता था होली उत्सव

होली की तैयारियां कम से कम 15 दिन पहले शुरू हो जाया करती थीं। जहां होलिका जलती थी, उस जगह को सजाने की प्रतियोगिता होती थी। बड़ी खूबसूरत होलिका सजाई जाती थी। जिस तालाब के किनारे होलिका सजती थी, वहां पर पेड़-पौधे तक सजाए जाते थे। अब तो बड़ा सूनापन आ गया है होली में। होलिका गाड़ना, बसंत पंचमी की परम्परा, यह सब आज की पीढ़ी जानती ही नहीं। गांव हो या शहर, तब संयुक्त परिवारों में होली का मजा आता था। बड़ों का आशीर्वाद लेने के लिए भी होड़ लगती थी। होलिका जलने के बाद सब बच्चे पूरे गांव में बड़ों के पैर छूने निकलते थे। बिना भेदभाव के सबसे आशीर्वाद लेते थे। पूरी रात कोई सोता नहीं था। रात भर फाग चलता थे। अगले दिन होली मिलन भी टोलियों में होता था। यह दो दिन चलता था। फाग का खूब रंग जमता था। 

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  • Web Title:The memories of Holi festival