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सुशील हमारे बीच असंतोष छोड़ गए...

लखनऊ। वरिष्ठ संवाददातासुशील सिद्धार्थ ने कभी कहा था, साहित्य समाज का दर्पण है और असंतोष साहित्य का दर्पण है।' उनके साहित्य को जितना भी पढ़ा वाकई में कभी मन नहीं भरा। आज वह हमारे मन में असंतोष छोड़ गए।व्यंगकार, कथाकार सुशील सिद्धार्थ को याद करते हुए युवा व्यंगकार डॉ. पंकज प्रसून जिस वक्त ये विचार व्यक्त कर रहे थे, उनके चेहरे पर वो सूनापन नजर आया जो सुशील सिद्धार्थ के जाने से साहित्य जगत में आया है। सोमवार को वरिष्ठ व्यंगकार गोपाल चतुर्वेदी के घर पर सुशील सिद्धार्थ की स्मृति में श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया। सभा में बोलते हुए लेखक दयानंद पांडेय ने कहा कि सुशील सिद्धार्थ मूल रूप से प्रखर आलोचक थे। उनका कई मठाधीशों ने शोषण किया। इनके जीवन में व्यंग्य ऑक्सीजन का काम करता था। व्यंग्य उनकी व्यक्तिगत पीड़ा को व्यक्त करने का माध्यम था। हास्य कवि मुकुल महान ने कहा कि व्यंग्य लेखक समिति के माध्यम से उन्होंने देश भर के व्यंग्यकारों को जोड़ने का काम किया। गोपाल चतुर्वेदी ने अपने उद्गार व्यक्त करते हुए कहा कि सुशील से बहुत अपेक्षाएं थी। उनका जाना उन अपेक्षाओं का मर जाना है।

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  • Web Title:sushil