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सीतापुर : भूतेश्वरनाथ और विश्वनाथ बाबा का पुराणों में है जिक्र

सावन के सोमवार पर विशेष

सीतापुर | आशीष पाण्डेय

वैसे तो वेद भूमि पर स्थापित हर शिवविग्रह अनुपम है। लेकिन जिले भर में ऐसे कई शिवलिंग हैं जिनका उल्लेख पुराणों में है। हजारों साल से श्रद्धालु इन शिव पिंडियों की सेवा, पूजा मनोयोग से कर रहे हैं। धरती पर जितने भी देशों में हिन्दू वास करते हैं। उनका नैमिषारण्य धाम से गहरा नाता है। इसी धरती पर 88 हजार ऋषियों के साथ भगवान वेद व्यास ने वेदों का संकलन पूरा किया था। अपने पुत्र शुकदेव और शिष्य शौनक पर उन्होंने वेद, पुराणों के ज्ञान का दायित्व भी सौंपा था। सावन की विशेष शृंखला का आरंभ वेदभूमि नैमिषारण्य से है। नैमिषारण्य स्थित चक्रकुण्ड के दाहिनी ओर स्थित भूतेश्वरनाथ बाबा का महत्व विशेष है। नैमिषारण्य शक्ति पीठ की अधिष्ठात्री मां ललिता के दर्शन से पूर्व चक्रकुण्ड का आचमन और भूतेश्वरनाथ का दर्शन-पूजन प्राथमिक है। स्थानीय पुरोहितों की मानें तो भूतेश्वरनाथ की महिमा वही है जो काशी में विराजने वाले कालभैरव की है। यह भी नैमिषारण्य के कोतवाल माने जाते हैं। अब चूंकि मां ललिता देवी की पूजा-परंपरा वैष्णव पद्धति से जुड़ी है। एनिवंश ब्राह्मण पद्धति से भूतेश्वरनाथ की सात्विक पूजा ही होती है।

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तीनों पहर रंग बदलते हैं बाबा

तीनों पहर बाबा में बदलाव होता है। इसे लोग चमत्कार तो कुछ लोग धूप का शिवलिंग पर प्रभाव बताते हैं। सुबह बाबा के दर्शन बाल रूप में दोपहर में शांत रूप और शाम को मन को मोह लेने वाले मनोहरी रूप का दर्शन होता है। मंदिर में सुभाष चन्द्र बोस की साधना का भी उल्लेख है। कहते हैं कि आजादी के पहले सुभाषचन्द्र बोस ने यहां आकर उपासना की थी। यहीं उन्हें भैरव जी की सिद्धि भी प्राप्त हुई थी। इस वजह से इसका एक नाम सुभाष मंदिर भी है।

पुराणों में उस शिवलिंग का जिक्र होता है जो बिना कांटेदार बेल के पेड़ के नीचे स्थित है। मान्यता है कि इस श्वेत शिवलिंग की पूजा शिवभक्त अश्वत्थामा करता है। स्थानीय लोगों के मुताबिक सुबह शिवलिंग का पूजन हुआ मिलता है। इस शिवलिंग के सामने एक पोखर है। जिसे दशाश्वमेघघाट के नाम से जाना जाता है। देखरेख के अभाव में यह तीर्थ जीर्ण-शीर्ण हो चुका है।

इसी तीर्थ पर जिंदबाबा की समाधि भी है। मान्यता है कि जब नैमिषारण्य में सभी तीर्थों का आगमन हुआ था। तब काशी से बाबा विश्वनाथ आए थे। क्षेत्रीय पुरोहित इस शिवलिंग को विश्वनाथ शिवलिंग कहते हैं। पूजा के दौरान होने वाले संकल्प में भी इसे विश्वनाथ शिव कहा जाता है। ज्यादा निर्माण न होने की वजह से इस तीर्थ की प्राकृतिक सुरम्यता बरकरार है।

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गुप्त काल का है निर्माण

आरएमपी डिग्री कालेज के पूर्व प्रवक्ता ने बताया तीर्थ पर लगी ईंटों का आकार इतना बड़ा है, इतने बड़े आकार की ईंटों का निर्माण गुप्तकाल में हुआ करता था। इस वजह से मंदिर परिसर का निर्माण बहुत पुराना है। जबकि सामने स्थित पोखर को बाद में पक्का कराया गया है।

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ब्रह्मपुराण में भी है उल्लेख

लिंग पुराण में तो बाबा भूतेश्वर नाथ का उल्लेख है ही, ब्रह्मपुराण में भी इसका जिक्र आता है। पुजारी राजनरायण पांडेय ने बताया कि इसी जगह भगवान विष्णु को अपना सुदर्शन चक्र वापस मिला था। मान्यता है कि प्राचीन काल में विष्णु भक्त और शिवभक्त आपस में झगड़ बैठे। बात बढ़ने पर विष्णु को अपने भक्तों की और शिव को अपने भक्तों की सहायता के लिए आना पड़ा। अपने भक्तों की रक्षा के लिए शिव ने विष्णु के सुदर्शन चक्र को निगल लिया। विवाद वहीं समाप्त हो गया। जब दैत्यों की शक्ति बढ़ी और वह देवों पर भारी पड़ने लगे। तब देवताओं ने नैमिषारण्य आकर भगवान शिव की तपस्या की। तब भगवान शंकर ने भूतनाथ के रूप में प्रकट होकर अपने मुख से सुदर्शन चक्र को निकाला। तीर्थ के जल से सुदर्शन को स्नान कराकर चक्र, विष्णु को दोबारा प्रदान किया। तब विष्णु ने दैत्यों का वध सुदर्शन चक्र के माध्यम से किया।

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  • Web Title:Sitapur: The words of Bhuteshwarnath and Vishwanath Baba are mentioned in the Puranas