
प्रसाद और वृन्दावन लाल वर्मा ने समाज को जागरूक किया
Lucknow News - लखनऊ, कार्यालय संवाददाता उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान की ओर से वृन्दावन लाल वर्मा एवं
लखनऊ, कार्यालय संवाददाता उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान की ओर से वृन्दावन लाल वर्मा एवं जयशंकर प्रसाद स्मृति एक दिवसीय संगोष्ठी हुई। संगोष्ठी में वक्ताओं ने साहित्यकारों के लेखन पर प्रकाश डाला। डा. पुनीत बिसारिया ने कहा कि वृन्दावन लाल वर्मा अपने साहित्य में हमें एक अलग तरह के इतिहास से परिचित कराते हैं। वृन्दावन लाल वर्मा का झांसी की रानी उपन्यास में नारी सशक्तिकरण का एक अभूतपूर्ण चित्रण मिलता है। उनकी रचना विराटा की पद्मिनी एक ऐतिहासिक उपन्यास है। उनमें अभूतपूर्व कल्पना शक्ति थी, जिसे उन्होंने अपनी रचनाओं में प्रयोग किया है। वृन्दावन लाल वर्मा ने बुन्देलखण्ड की संस्कृति को अपनी रचनाओं में जीवन्त कर दिया।
सुरेन्द्र अग्निहोत्री ने कहा कि वृन्दावन लाल वर्मा ने हमें रानी लक्ष्मीबाई, विराटा की पद्मिनी, गढ़कुंढ़ार, मृगनयनी, कचनार जैसे उपन्यासों के माध्यम से पाठकों के सामने ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को प्रस्तुत किया है। गढ़कुंढ़ार उनकी एक प्रसिद्ध कृति है। डा. नीरज कुमार द्विवेदी ने कहा कि जयशंकर प्रसाद ने सारगर्भित साहित्य की रचना की। प्रसाद जी की रचनाओं में राष्ट्रीयता के तत्व विद्यमान हैं। प्रसाद जी के जीवन की विरह वेदनाओं का प्रभाव उनके साहित्य में दिखायी पड़ता है। इस अवसर पर वृन्दावन लाल वर्मा के उपन्यास कीचड़ और कमल अंश का पाठ सौम्या मिश्रा एवं अमरबेल रचना के अंश का पाठ उपासना जायसवाल ने किया। जयशंकर प्रसाद की रचना कंकाल के अंश का पाठ अनमोल शर्मा एवं आनंद सर्ग, कामायनी, आंसू की रचना का पाठ सुश्री मुस्कान सिंह द्वारा प्रस्तुत किया गया। संस्थान की प्रधान सम्पादक डा. अमिता दुबे ने संचालन किया।

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