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वाल्मीकि रामायण में छुपे हैं वैदिक संस्कृति के रहस्य: स्वामी राघवाचार्य

-वाल्मीकि और रामचरितमानस में काल का बड़ा अंतर

-श्री रामकथा का उद्देश्य मानव मात्र का कल्याण करना

लखनऊ। पल्लव शर्मा

वाल्मीकि रामायण और तुलसीदास लिखित रामचरितमानस में सबसे बड़ा अंतर तो काल का है। श्रीमज्जगद्गुरू रामानुजाचार्य स्वामी राघवाचार्य जी कहते हैं कि भगवान श्री राम जब राजा थे तभी वाल्मीकि रामायण लिखी गई। उस काल में उनको ये कथा उनके पुत्र लव और कुश ने सुनाई। इन दिनों वे लखनऊ में मोती महल लॉन में वाल्मीकि रामायण की कथा का वाचन कर रहे हैं। वे कहते हैं कि वाल्मीकि रामायण में वैदिक संस्कृति को समझने के रहस्य छुपे हुए हैं। उनका भी यही सतत प्रयास है कि संपूर्ण सृष्टि के कल्याण के इस वैदिक ग्रंथ का लाभ अपनी कथा के माध्यम से आम जनता को देते रहें।

'हिन्दुस्तान' ने बुधवार को उनसे विशेष बातचीत की। इस दौरान मालूम चला कि अयोध्या में कनक भवन के पास निवास करने वाले स्वामी राघवाचार्य जी ने 20 वर्षों से वाल्मीकि रामायण का अध्ययन कर कथा कहना शुरू की। वे बताते हैं कि यह अध्ययन उन्होंने अपने गुरुओं के चरणों में रहकर प्राप्त किया। वह बताते हैं कि श्री राम कथा के माध्यम से ही समाज का भौतिकता के साथ आध्यात्मिक विकास संभव है। ऐसा विकास ही मानव जाति को उच्चतम शिखर तक ले जा सकता है। उन्होंने वाल्मीकि रामायण और रामचरितमान के मूलभूत अंतर पर चर्चा करते हुए कहा कि कालखंड का अंतर सबसे बड़ा अंतर होता है। इसलिये कई कहानियों और प्रसंगों का अंतर भी इसी कारण दोनों कथाओं को श्रवण करने में मिलता है। उन्होंने बताया कि वाल्मीकि रामायण को प्राप्त करके ही सभी कवियों और लेखकों ने अपने ग्रंथों की लेखनी को विस्तार दिया है। वे बताते हैं कि वाल्मीकि रामायण में सात कांड हैं। 24 हज़ार स्लोक हैं और 500 सर्ग हैं। वाल्मीकि रामायण का पाठ काफी कम क्यों होता है ? इसका जवाब देते हुए स्वामी राघवाचार्य जी कहते हैं कि संस्कृत में ग्रंथ का होना इसका बड़ा कारण है। वे बताते हैं कि मानस रामायण के माध्यम से भगवान की राम कथा काफी सरल और सुगम हो गई है। इस कारण से गोस्वामी तुलसीदास रचित श्री रामचरितमानस का पाठ अधिक सुनाई देता है।

चित्रकूट और अयोध्या में चल रहा वाल्मीकि रामायण का स्वाध्याय

स्वामी राघवाचार्य बताते हैं कि अयोध्या और चित्रकूट में काफी लोग वाल्मीकि रामायण का स्वाध्याय कर रहे हैं। भगवान श्री राम को ही क्यों माना जाये? का उत्तर देते हुए कहते हैं कि भगवान तो एक ही हैं। उनके रुप अनेक हैं। मनुष्य अपनी रुचि के अनुसार भगवान की पूजा करता है। जहां तक भगवान राम का सवाल है तो वो एक आदर्श पुरुष हैं। मानव मात्र के लिये इस तरह के आदर्श पुरुष का चरित्र सबका मंगल करने वाला होता है।

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