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पं. हरिप्रसाद चौरसिया

फ्रांस की प्रार्थनाओं में घुली हिन्दुस्तानी बांसुरी

-ला मार्टीनियर ब्वॉएज कॉलेज में बॉन्जॉर इंडिया व आलियांज फ्रांसे का आयोजन

-लोगों ने सुनी फ्रांस के बैंड संग भारतीय शास्त्रीय संगीत की जुगलबंदी

लखनऊ। वरिष्ठ संवाददाता

अवध में फ्रांसीसी सभ्यता, कला व संस्कृति का गढ़ माना जाने वाले ला मार्टीनियर ब्वॉएज कॉलेज का परिसर गुरुवार की शाम 14वीं शताब्दी के फ्रांसीसी संगीत से गूंज उठा। खास बात यह थी कि फ्रांस के गीतों संग यहां भारतीय शास्त्रीय संगीत और हिन्दुस्तानी बांसुरी की धुनों की बेहतरीन जुगलबंदी भी सुनने को मिली।

हालांकि कार्यक्रम के मुख्य आकर्षण प्रख्यात बांसुरी वादक पं. हरिप्रसाद चौरसिया के यहां न आने के कारण सुनने वालों को निराशा हुई। मगर पं. चौरसिया के ही शागिर्द विवेक सोनार ने यहां बड़ी खूबसूरती से इस कमी को पूरा किया। शहर के जानेमाने लोगों और ला मार्ट्स के तकरीबन 150 बच्चों की मौजूदगी में यह कार्यक्रम शुरू हुआ। फ्रांस के बैंड 'डिबोलस इन म्यूजिका' के कलाकार एंटोनी गर्बर, आर बॉले, ऑलिवर गरमॉण्ट, इमैनुएल विस्टोर्की, जीन फ्रैंकोइस डेलमास और फिलिप रोशी मंच पर पारम्परिक फ्रेंच अंदाज में पहुंचे। विवेक सोनार ने बांसुरी की तान छेड़ कार्यक्रम की शुरुआत की और उसके बाद बैंड के कलाकारों ने प्रार्थनाओं के सुर छेड़े। तकरीबन एक घंटे चले कार्यक्रम में फ्रंसीसी गीतों संग हिन्दुस्तानी संगीत का अद्भुत संगम देखने को मिला।

14वीं शताब्दी की विलुप्त हो चुकी कला: कार्यक्रम में जो फ्रांसीसी गीत गाए जा रहे थे, वे साधारण प्रार्थनी गीत नहीं थे। आलियांज फ्रांसे लखनऊ के अध्यक्ष रिचर्ड फ्रैंको ने बताया कि ये फ्रांस के वो प्राचीन प्रार्थनाएं हैं जो अब लगभग विलुप्त हो चुकी हैं। इन्हें 14वीं शताब्दी या संभवत: उससे भी पहले वहां के कैथोलिक चर्चों में गाया जाता था। भारतीय शास्त्रीय संगीत के साथ जुलगबंदी कर इन प्रार्थनाओं व इस कला को सहेजने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने यह भी बताया कि ये गीत चर्च में गाए जरूर जाते थे लेकिन इन्हें कैरल नहीं कहा जा सकता।

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तबीयत बिगड़ने के कारण नहीं आए पं. हरिप्रसाद

ला मार्ट्स के परिसर में कार्यक्रम शुरू होने के लगभग एक घंटे पहले से ही लोग आने लगे थे। फ्रेंच समझने वाले तो लखनऊ में गिने-चुने लोग ही हैं, तो जाहिर है कि ज्यादातर लोग पं. हरिप्रसाद चौरसिया की बांसुरी को सुनने आए थे। मगर जब कार्यक्रम शुरू होने से पहले ही यह घोषणा हुई कि पं. हरिप्रसाद यहां नहीं आ रहे हैं, तो उनके प्रशंसकों को काफी निराशा हुई। आयोजकों से पता चला कि तबीयत खराब होने के चलते पंडित जी कार्यक्रम स्थल पर नहीं पहुंचे और होटल से सीधे मुम्बई के लिए एयरपोर्ट निकल गए।

दिन में पूरी तरह स्वस्थ थे: पं. हरिप्रसाद ने इसी कार्यक्रम के संदर्भ में गुरुवार को दिन में पत्रकारों से मुलाकात भी की। उस वक्त वह पूरी तरह स्वस्थ थे और कार्यक्रम को लेकर खासे उत्साहित भी। बातचीत के दौरान उन्होंने कार्यक्रम की पूरी रूपरेखा बताई और इस जुगलबंदी के बारे में भी ढेरों बातें की। इसके बाद शाम को उनका कार्यक्रम में न पहुंचना कइयों को निराश कर गया।

लगे तमाम कयास: हालांकि आलियांज फ्रांसे लखनऊ के अध्यक्ष रिचर्ड फ्रैंको ने यही कहा कि पंडित जी तबीयत बिगड़ने के चलते वापस चले गए। उन्हें थकावट हो गई थी और वह प्रस्तुति देने में सहज महसूस नहीं कर रहे थे। मगर इस तरह अचानक उनके जाने को लेकर कार्यक्रम स्थल पर तमाम तरह के कयास लगाए गए। सूत्रों की मानें तो कार्यक्रम की फीस को लेकर आयोजकों से बात नहीं बनी, जिसके चलते पं. चौरसिया ने प्रस्तुति नहीं दी। ये सवाल भी उठे कि अगर तबीयत खराब हुई तो उन्हें पहले अस्पताल क्यों नहीं ले जाया गया और सीधे मुम्बई क्यों जाने दिया गया।

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(पं.हरिप्रसाद चौरसिया से दिन में हुई बातचीत)

यह फ्यूजन नहीं, जुगलबंदी है...

पं. हरिप्रसाद चौरसिया फ्रांस के कलाकारों संग प्रस्तुति देने वाले थे तो बातचीत के दौरान उनसे पहला सवाल यही हुआ कि इसे इंडो-फ्रेंच फ्यूजन कहा जाए या नहीं। इस पर उनका जवाब था कि यह फ्यूजन कतई नहीं है, बल्कि इसे जुगलबंदी या संगत कहा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जिस तरह वह भारतीय गीतों पर बांसुरी की जुगलबंदी करते हैं, उसी तरह फ्रेंच गीतों की धुनों पर बांसुरी बजाएंगे। उन्होंने कहा कि यह उनके बाकी कॉन्सर्ट से बिल्कुल अलग नहीं है, फर्क सिर्फ इतना है कि मंच पर दो देशों के कलाकार नजर आएंगे। उन्होंने बताया कि फ्रांस की जो धुनें यहां गूंजेंगी वो असल में राग ध्रुपद पर आधारित हैं। हिन्दी फिल्मों की कई मशहूर धुनें बनाने वाले पं. चौरसिया अब फिल्मों के लिए काम नहीं करते। इसकी वजह पूछने पर वह कहते हैं, 'शायद समय थोड़ा खराब आ गया है, अब वैसी फिल्में बनती ही नहीं कि जिनमें बांसुरी की धुन की जरूरत पड़े।'

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