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अपने काम से जीता था लखनऊ के लोगों का दिल

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प्रदेश के दो बार पुलिस महानिदेशक और लखनऊ के एसएसपी रहे स्व. श्रीराम अरुण ने समाज से अपराधों को खत्म करने के लिए अपना जीवनकाल लगा दिया। उनकी पुलिस और समाज के लिए की गई उत्कृष्ट सेवाओं के लिए राष्ट्रपति पदक से सम्मानित भी किया गया।

1963 बैच के आईपीएस रहे श्रीराम अरुण मूलत: कन्नौज के रहने वाले थे। वह विभिन्न जिलों के अलावा एडीजी लखनऊ, मेरठ के अलावा एडीजी लॉ एंड आर्डर भी रहे। वह लखनऊ के एसएसपी भी रहे। अपने काम करने के तरीके से उन्होंने लखनऊ के लोगों का दिल भी जीता और अपराधियों को सलाखों के पीछे पहुंचाया था। वो अपने काम के कारण हमेशा सुर्खियों में रहते थे। इसी तरह उन्होंने डीजीपी का ओहदा हासिल किया था। वह दो बार प्रदेश के डीजीपी बने। पहली बार 1997 में और दूसरी बार 1999 में डीजीपी बने। वर्ष 2000 में डीजीपी पद से सेवानिवृत्त होने के बाद श्रीराम अरुण वर्ष 2001-2004 तक उत्तर प्रदेश अनुसूचित जाति जनजाति आयोग के अध्यक्ष भी रहे थे। पुलिस महकमे में श्रीराम अरुण को काम के लिए याद किया जाता है। वह एडीजी तकनीकी सेवाएं असीम अरुण के पिता थे।

पुलिस माडर्न स्कूल की स्थापना की

1971 के युद्ध में बांग्लादेश फ्रंटीयर पीएसी सेनानायक के रूप में युद्ध में हिस्सा लिया। जिसके लिए पूर्वी स्टार और संग्राम पदक से अलंकृत किया गया। पुलिस कर्मियों के कल्याण के लिए पुलिस मॉडर्न स्कूल की स्थापना की। पुलिस कर्मियों के बेहतर इलाज के लिए जीवन रक्षक निधि की व्यवस्था कराई। उन्होंने अपने डीजीपी बनने के दूसरे कार्यकाल में कानून व्यवस्था और विवेचना को अलग करने की नींव डाली थी।

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मेरे पिताजी अत्यंत सफल पुलिस अधिकारी और लोकप्रिय व्यक्तित्व के धनी थे। इसके साथ ही वे पिता और पति के रूप में भी अपनी जिम्मेदारियों के निर्वहन से कभी पीछे नहीं रहे। वे मेरे सुपर कॉप भी हैं और सुपर पिता भी।

असीम अरुण

एडीजी, तकनीकी सेवाएं

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