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पीजीआई में बिना सर्जरी के गर्भाशय के ट्यूमर का इलाज मुमकिन

-पीजीआई में आयोजित चार दिवसीय इंटरवेंशन रेडियोलाजिकल अधिवेशन में देश भर से जुटो रेडियोलॉजिस्टों ने आधुनिक तकनीकि साझा की-सर्जरी के मुकाबले इंटरवेंशन रेडियोलॉजी तकनीकि में जोखिम कम हैंलखनऊ। निज संवाददातापीजीआई में अब बिना सर्जरी के गर्भाशय के ट्यूमर (फायब्रायड)का इलाज इंटरवेंशन रेडियोलॉजी तकनीकि से संभव है। अल्ट्रासाउण्ड या सिटी स्कैन की मदद से गर्भाशय के ट्यूमर की स्थिति और उसके आकार को देखा जाता है। साथ ही ये भी देखा जाता है कि ट्यूमर को कौन सी नस खून सप्लाई कर रही है। इस तकनीकि से सूई के जरिए ट्यूमर को खून सप्लाई करने वाली नस को क्वायल व पाली बिनायल एल्कोहल (पीबीए) के जरिए बंद कर दिया जाता है। लिहाजा ट्यूमर को खून न मिलने पर कुछ दिन बाद यह ट्यूमर छोटे होने के साथ-साथ सूख जाता है। इस तकनीकि में सर्जरी के मुकाबले मरीज को कम दिक्कत के साथ ही खर्चा भी कम होता है। यह जानकारी पीजीआई के रेडियोलॉजी विभाग द्वारा आयोजित चार दिवसीय इंटरवेंशन रेडियोलॉजिकल तकनीकि पर आयोजित कांफ्रेंस के आखिरी दिन संस्थान के रेडियोलॉजी विभाग के डॉ. शिवकुमार ने दी। 20 से 30 फीसदी महिलाओं में होती है दिक्कतगर्भाशय में ट्यूमर की दिक्कत 20 से 30 फीसदी महिलाओं में पायी जाती है। जिसकी वजह से महिलाएं गर्भधारण नहीं कर पाती है। यदि गर्भधारण हो भी गया तो ट्यूमर का आकार बढ़ता जाता है। जिसके चलते गर्भ में फल रहे शिशु में दबाव पडता है। इससे शिशु का विकास नहीं पाता है। साथ ही ट्यूमर की वजह से भारी मात्रा में रक्त स्राव होने का खतरा बना रहता है। अमूनन ट्यूमर से पीड़ित महिलाएं सर्जरी ही कराती हैं। सर्जरी कई तरह के जोखिम होते हैं। कई दिन तक अस्पताल में रुकने के साथ मरीज को दिक्कत और खर्च भी अधिक उठाना पड़ता है। जबकि इंटरवेंशन रेडियोलॉजी द्वारा ट्यूमर का इलाज आसान और सस्ता भी है। पीजीआई में स्थापित होगी एमआर हाइफू तकनीकि डॉ. शिव कुमार बताते हैं कि गर्भाशय के ट्यूमर के इलाज के लिए एमआर हाई इंटेस्टी फोकस अल्ट्रासाउंड (एमआर हाइफू) तकनीक बहुत आसान है। इस तकनीकि में न कोई सूई डाली जाती है और न ही कोई चीरा-टांका लगाया जाता है। यह तकनीकि पीजीआई में स्थापित करने की योजना चल रही है। डेढ़ वर्ष में यह सुविधा पीजीआई में शुरू हो जाएगी। इस तकनीकि से उच्च तीव्रता के अल्ट्रासाउण्ड की तरंगों के जरिए ट्यूमर को खत्म कर दिया जाता है। इस तकनीकि में मरीज को पूरी तरह से सुरक्षित रहता है।क्रायोथिरेपी से नष्ट होगा कैंसरदिल्ली स्थित आईएलबीएस के रेडियोलाजिस्ट डॉ. यशवंत पट्टीदार ने बताया कि लिवर, फेफड़ा, गुर्दा सहित शरीर के दूसरे अंगों में ट्यूमर होने पर अमूमन इंटरवेंशन तकनीक से कैंसर को खत्म किया जाता है। जबकि रेडियोफ्रिक्वेंसी एबीलेशन तकनीक से ट्यूमर पर हाई करंट देकर कैंसर को खत्म किया जाता है। जबकि क्रायो थिरेपी तकनीकि के जरिए ट्यूमर का तापमान माइनस 40 डिग्री सेल्सियस किया जाता है। जिससे कैंसर खत्म हो जाता है। यह तकनीक कारगर है। अब जल्द ही यह तकनीकि भी देश के कुछ संस्थानों में शुरू होगी। डॉ. पट्टीदार ने बताया कि गुर्दा खराब होने की स्थिति में मरीज को डायलसिस कराने के लिए फेस्चुला बनाया जाता है। एक से दो साल में 70 फीसदी से अधिक मरीजों में यह फेस्चुला बंद हो जाता है या नस पतली हो जाती है। ऐसे में दोबारा फेस्चुला बनाना काफी मुश्किल होता है। लिहाजा इंटरवेंशन तकनीकि के जरिए बंद नस को खोलने में काफी मददगार है।

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