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गुर्दे के कैंसर का पता लगाने के लिए कराएं अल्ट्रासाउंड जांच

गुर्दे के कैंसर से बचना है तो साल में एक बार कराएं अल्ट्रासाउंड जांच

पेशाब से खून आने पर संजीदा हो जाना चाहिए। यह गुर्दे के कैंसर का एक लक्षण हो सकता है। गुर्दे के कैंसर की पहचान के लिए साल में एक बार कम से कम अल्ट्रासाउंड जांच करानी चाहिए। इससे बीमारी को शुरुआत में पकड़ा जा सकता है। शुरुआत में गुर्दे के कैंसर का ऑपरेशन से इलाज संभव है। इलाज में देरी से कैंसर की सारी विधाएं कम असर करती हैं। यह जानकारी केजीएमयू सीएमएस व यूरोलॉजी विभाग के अध्यक्ष डॉ. एसएन शंखवार ने दी।

वह शनिवार को सांइटिफिक कन्वेंशन सेंटर में यूरो-आंकोकॉन 2018 को संबोधित कर रहे थे। केजीएमयू, संस्था, राजीव गांधी चिकित्सा संस्थान, पीजीआई, लखनऊ यूरोलॉजी क्लब की ओर से कार्यशाला हो रही है। डॉ. एसएन शंखवार ने बताया कि कुल कैंसर मरीजों में एक से दो प्रतिशत को गुर्दे का कैंसर हो रहा है। अफसोस की बात यह है कि मरीज को शुरुआत में लक्षण नजर नहीं आते हैं। मर्ज गंभीर होने पर अस्पताल आ रहे हैं। उन्होंने बताया कि अल्ट्रासाउंड में गांठ नजर आने पर सीटी स्कैन कराना चाहिए। डॉक्टर की सलाह पर ऑपरेशन करा लेना चाहिए।

तम्बाकू से गुर्दे के कैंसर का खतरा

चक गजरिया स्थित कैंसर संस्थान के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. एचएस पाहवा ने बताया कि तम्बाकू के सेवन से बचना चाहिए। क्योंकि इसमें तमाम घातक कैमिकल कैंसर को बढ़ावा देते हैं। कैमिकल मुंह से खून में मिलकर गुर्दे तक जाते हैं। इसके बाद कैंसर का कारण बनते हैं। ऐसे मरीजों को ऑपरेशन व रेडियोथेरेपी से इलाज मुमकिन है।

बिना दर्द पेशाब में खून आने पर हो संजीदा

केजीएमयू यूरोलॉजी विभाग के डॉ. मनोज कुमार यादव ने बताया कि 50 साल की उम्र के बाद यदि पेशाब से बिना दर्द खून आए तो संजीदा हो जाना चाहिए। यह गुर्दे के कैंसर की एक वजह हो सकती है। ऐसे मरीजों का ऑपरेशन से इलाज संभव है। दूरबीन विधि से ऑपरेशन किया जा सकता है।

पथरी भी बन सकती है कैंसर

केजीएमयू यूरोलॉजी विभाग के डॉ. राहुल जनक सिन्हा ने बताया कि गॉल ब्लैडर में होने वाली पथरी को लंबे समय तक नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यह आगे चलकर कैंसर बन सकता है। उन्होंने बताया कि 60 प्रतिशत मरीजों में तीन से पांच मिलीमीटर की पथरी अधिक पानी पीने से निकल सकती है। पर, सभी मामलों में ऐसा नहीं कहा जा सकता है। यह तय होता है कि पथरी गॉल ब्लैडर या गुर्दे के किस हिस्से में हे। ऑपरेशन से पथरी को निकालना ही बेहतर है। लंबे समय तक पथरी होने से स्वस्थ्य कोशिकाओं में जख्म हो जाता है। इससे कैंसर की आशंका बढ़ जाती है।

प्रोस्टेट कैंसर का इलाज रेडियोथेरेपी से

लोहिया संस्थान में रेडियोथेरेपी विभाग के अध्यक्ष डॉ. मधूप रस्तोगी ने कहा कि प्रोस्टेट कैंसर में मामलों में तेजी से इजाफा हो रहा है। तमाम ऐसे मरीज होते हैं जिनका ऑपरेशन संभव नहीं होता है। ऐसे मरीजों का रेडियोथेरेपी से इलाज संभव है। इमेज गाइडेड रेडियोथेरेपी से सीधे प्रोस्टेट कैंसर कोशिकाओं पर हमला किया जाता है। इससे मर्ज आसानी से ठीक हो जाता है।

60 साल की उम्र पार करने वाले कराएं जांच

चक गजरिया स्थित कैंसर संस्थान में रेडियोथेरेपी विभाग के अध्यक्ष डॉ. शरद सिंह ने बताया कि 60 साल की उम्र पार करने वाले पुरुषों में प्रोस्टेट कैंसर का खतरा बढ़ जाता है। जब दवा व ऑपरेशन से प्रोस्टेट का इलाज संभव नहीं होता है तब रेडियोथेरेपी से इलाज किया जा सकता है। प्रोस्टेट कैंसर से बचने के लिए समय-समय पर जांच कराएं। प्रोस्टेट की परेशानी होने पर दवा व ऑपरेशन कराएं। देरी से मर्ज गंभीर हो जाता है। ऑपरेशन करना कठिन हो जाता है।

बिना किडनी निकाले हट सकता है कैंसर

केजीएमयू के यूरोलॉजी विभाग डॉ. मनमीत ने बताया कि किडनी में हुए कैंसर के बाद अब तक पूरी किडनी ही निकाल दी जाती थी। मगर अब नई तकनीक के जरिये नेफ्रॉन स्पैरिंग सर्जरी से कैंसर प्रभावित किडनी को निकल दिया जाता है। वहीँ बची हुई किडनी व्यक्ति के शरीर में काम करती रहती है। उन्होंने बताया कि शरीर में बची हुई 20 प्रतिशत किडनी भी व्यक्ति को आम जीवन जीने में पूरी मदद करती है।

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केजीएमयू में गुर्दे कैंसर का इलाज हुआ आसान

केजीएमयू में यूरोलॉजी व ट्रांसप्लांट विभाग के डॉ. मनमीत सिंह ने बताया कि गुर्दे के कैंसर का इलाज आसान हो गया है। पहले गुर्दे का कैंसर होने पर उसे ऑपरेशन कर हटा दिया जाता था। अब सिर्फ ट्यूमर वाले हिस्से को ही निकाला जा रहा है। इससे मरीज को डायलिसिस पर जाने से काफी हद तक बचाने में कामयाबी मिल रही है। केजीएमयू में इस तरह का ऑपरेशन की सुविधा शुरू हो गई। चिकित्सा विज्ञान में ऑपरेशन की इस तकनीक को नेफरॉन स्पेयरिंग सर्जरी कहते हैं।

डॉ. मनमीत सिंह ने बताया कि सामान्य लोगों में गुर्दे का आकार 12 सेंटीमीटर होता है। यदि गुर्दे 20 प्रतिशत से अधिक ठीक है तो मरीज को डायलिसिस पर जाने से बचाया जा सकता है। अभी तक गुर्दे के कैंसर का पता चलने पर ऑपरेशन कर उसे पूरा निकलना पड़ रहा था। दोनों गुर्दे में बीमारी होने पर दिक्कत बढ़ जाती है। दोनों गुर्दे निकालने पड़ते हैं। अब इन परेशानी से मरीजों को बचाना आसान हो गया है। सिर्फ ट्यूमर वाले हिस्से को ही निकाला जा रहा है। नेफ्रॉन को सुरक्षित बचाने की कोशिश की जाती है।

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