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दवाओं की किल्लत से फूली मरीजों की सांसें

-जीवनरक्षक दवाओं के संकट झेलना पड़ रहा मरीजों को

लखनऊ। कार्यालय संवाददाता

सरकारी अस्पतालों में दवाओं के संकट गहरा गया है। मरीजों को मामूली बीमारी की दवाएं भी नहीं मिल रही हैं। वहीं कंपनियों ने भुगतान के अभाव में अस्पतालों में दवा की सप्लाई रोकने की चेतावनी दी है। इसका खामियाजा गरीब मरीजों को भुगतना पड़ रहा है। मरीज बाजार से दवाएं खरीदने को मजबूर हैं।

बलरामपुर, लोहिया, सिविल, रानी लक्ष्मीबाई, भाऊराव देवरस समेत दूसरे अस्पतालों में आयरन, प्रोस्टेट में दी जानी वाली यूरी मैक्स-डी, इलेक्ट्रोलाइट, त्वचा रोगों में इस्तेमाल होने वाले ट्यूब का जबरदस्त संकट है। सांस के मरीजों की दवाओं का संकट है। इंजेक्शन डेक्सामेटासोन व इनहेलर भी मरीजों को नहीं मिल रहा है। ब्लड प्रेशर के मरीजों के लिए मेट्रोप्रोलॉल, इको स्प्रिन समेत दूसरी जीवनरक्षक दवाएं मरीजों को नहीं मिल रही हैं। बीते तीन महीने से अस्पतालों में दवाओं की किल्लत है। इस संबंध में मरीज लगातार अधिकारियों से शिकायत कर रहे हैं लेकिन सुनवाई नहीं हो रही है।

कंपनियों ने दवा सप्लाई से किया इनकार

बकाया भुगतान न होने से तमाम कंपनियों ने दवा आपूर्ति रोक दी है। बताया गया है कि अस्पतालों में पर्याप्त बजट पड़ा है। इसके बावजूद अधिकारी भुगतान नहीं कर रहे हैं। भुगतान संबंधी फाइलें रोके हैं। अधिकारियों और कंपनी में आपसी तकरार का खामियाजा मरीजों को भुगतना पड़ रहा है।

इस बार मिला अधिक बजट

सरकारी अस्पतालों को दवाओं के संकट से ऊबारने के लिए शासन ने अधिक बजट जारी किया गया। स्वास्थ्य विभाग के महानिदेशक डॉ. पदमाकर सिंह ने बताया कि पिछले वित्तीय वर्ष में शासन ने 517 करोड़ रुपये का बजट जारी किया था। इस साल 619 करोड़ रुपये का बजट जारी किया है। अब तक 74 प्रतिशत बजट अस्पतालों को भेजा जा चुका है। यह रकम लगभग 450 करोड़ रुपये है। उन्होंने बताया कि दवा कंपनियों के पुराने बकाया भुगतान के लिए अलग से व्यवस्था की गई है। अस्पताल के अफसरों को एडिशनल डायरेक्टर से बिलों का वेरीफिकेशन कराना होगा। उसके बाद बजट जारी किया जा रहा है। करीब 25 से 30 करोड़ रुपये का बकाया था।

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