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मानवीय गतिविधियों से सिकुड़ते जा रहे हिमालय में ओक वन

- बीजों के अंकुरण व वृद्धि में प्रतिकूल प्रभाव पड़ने से पैदा हुई परिस्थितियांलखनऊ। मानवीय गतिविधियों के कारण हिमालय में पाए जाने वाले ओक वन लगातार सिकुड़ते जा रहे हैं। मनुष्यों द्वारा इन वनों से जलाऊ लकड़ी समेत अन्य अवशेषों को इकट्ठा करने से अक्सर इनके फल व बीज जंगली जंतुओं द्वारा खा लिए जाते हैं या फिर जल्दी सूख जाते हैं। जिसका इनके बीजों के अंकुरण और वृद्धि में प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। जर्मनी से आए वैज्ञानिक प्रो. अलबर्ट रीफ ने बुधवार को एनबीआरआई में पौधों व पर्यावरणीय प्रदूषण पर छठें अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में ओक वनों के पुनरुत्पादन पर आधारित व्याख्यान में ये तथ्य रखे। उन्होंने बताया कि ओक के प्रत्येक 10 हजार बीजों में से मात्र एक ही वृक्ष में परिवर्तित हो पाता है। एनबीआरआई के निदेशक प्रो. एसके बारिक ने कहा कि मानवीय गतिविधियों के कारण भारत में मात्र 30 फीसदी ओक वन बचे हैं। दूसरे देशों में ओक वृक्षों को आर्थिक महत्त्व के उत्पादों और सेवाओं के लिए प्रयोग किया जाता है। जबकि भारत में इन वृक्षों का उपयोग जलाऊ ईंधन की लकड़ी के रूप में ही होता है जिसके चलते इनकी संख्या दिनों दिन घटती जा रही हैं। उन्होंने ओक वनों के संरक्षण के लिए अघिक से अधिक शोध किये जाने का आवाहन किया। सत्र के दौरान हिमालय में चीड़ वृक्षों द्वारा ओक वनों के अतिक्रमण से भी इनके अस्तित्व पर पड़ने वाले संकट पर भी विचार विमर्श किया गया। दूसरे सत्र में डॉ आलोक सिन्हा ने धान के पौधों पर जलमग्नता को सहन करने की क्षमता के नियंत्रण पर चर्चा की। डॉ. अनीता शर्मा ने धार्मिक गतिविधियों से राजस्थान में पुष्कर सरोवर की जल गुणवत्ता पर पड़ने वाले प्रभाव पर प्रकाश डाला। सेमिनार में 21 देशों एवं भारत के अलग अलग हिस्सों से पधारे वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं ने प्रदूषण व जलवायु परिवर्तन के प्रभावों पर आधारित नौ विशिष्ट व्याख्यानों, 48 मौखिक प्रस्तुतियों और 73 पोस्टर प्रस्तुतियों के माध्यम से विभिन्न विषयों पर किये गए शोध कार्यों को भी रखा।

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