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दारूल कजा को इस्लामी अदालत कहना गलत -मौलाना खालिद रशीद

लखनऊ। कार्यालय संवाददाता

इस्लामी अदालत पर देश में जारी बहस पर शुक्रवार को इमाम ईदगाह मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली ने कहा कि दारूल कजा को इस्लामी अदालत का नाम देकर देश की जनता के अंदर भ्रम फैलाया जा रहा है। यह बहुत ही अफसोसनाक और निंदनीय है। उन्होंने कहा कि दारूल कजा इस्लामी अदालत नहीं है। दारुल कजा में सिर्फ निकाह, खुला, मेहर व विरासत से जुड़े मामलों पर शरीयत के हिसाब से फैसले दिए जाते हैं।

मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली ने कहा कि इस्लामी अदालतें सिर्फ इस्लामी देशों में ही स्थापित है। जहां सिर्फ घरेलू झगड़े ही नहीं बल्कि सिविल और क्रिमिनल केसों को भी इस्लामी कानून के तहत हल किया जाता है। वहीं, हिन्दुस्तान धर्म निरपेक्ष राज्य है। इस मुल्क में इस्लामी अदालतें की कोई गुंजाइश नहीं है। मौलाना ने कहा कि दारुल कजा सिर्फ मुसलमानों के शरई मसायल हल करने के लिए होते हैं। यहां पर हर साल निकाह, फस्खे निकाह, मेहर व विरासत से जुड़े हजारों मामले हल किए जाते हैं। दारुल कजा की खासियत ये है कि बिना किसी खर्च के बहुत कम समय में यहां पर महिलाओं को उनके अधिकार दिलाए जाते हैं।

तलाक के कम होते हैं केस

मौलाना खालिद रशीद ने कहा कि दारूल कजा के हस्तक्षेप की वजह से तलाक के मामलों में कमी आई है। पति-पत्नी के बीच जो भी विवाद होता है, दारूल कजा उसे खत्म करने का काम करती है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट भी दारूल कजा के खिलाफ हुई याचिका को खारिज कर चुकी है। यही नहीं दारूल कजा देश की न्यायालयों के लिए सभी सहायक है। विदेशों में दारूल कजा की स्थापना की जा रही है। जो वहां के लोगों के लिए सहायक साबित हो रही है।

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