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मिशन 2019 : भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती वोट प्रतिशत बढ़ाने की

सपा -बसपा के गठबंधन से भाजपा के सामने वर्ष 2014 के प्रदर्शन को 2019 में दोहरा पाना काफी मुश्किल होगा। इस गठबंधन से भाजपा के सामने चुनौतियां तो खड़ी ही हो गई हैं उसकी कमजोरियां और उलझने अलग चुनौती बनी हैं। 

2014 में यूपीए सरकार के लगातार 10 सालों की खामियों का फायदा उठाकर केंद्र में भाजपा सरकार आई थी। भाजपा सरकार को अपने  पौने पांच साल के कार्यकाल और करीब पौने दो साल की प्रदेश सरकार की सत्ता की कमजोरियों को चुनाव के लिए रह गए अब करीब 100 दिनों में दूर करना आसान नहीं होगा।

भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती वोट प्रतिशत बढ़ाने की है। हालांकि, भाजपा 51 फीसदी तक मत प्रतिशत बढ़ाने के लक्ष्य को लेकर चल रही है लेकिन इसे पाने के लिए भाजपा की राह आसान नहीं है। 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद सिंकदरा (कानपुर देहात) के विधानसभा उपचुनाव को छोड़कर भाजपा तीन लोकसभा के उपचुनाव (गोरखपुर, फूलपुर और कैराना) और एक विधानसभा (नूरपुर-बिजनौर) उपचुनाव हार गई। हार की मुख्य वजह यह रही कि भाजपा की सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाने वाले कार्यकर्ता प्रदेश सरकार में अपनी उपेक्षा से खिन्न होकर घर बैठ गए थे। वे अब भी नाराज हैं। 

राममंदिर के निर्माण पर विहिप की पिछले साल चलाई मुहिम को जनता का अपार जनसमर्थन मिला। आरएसएस, विहिप और साधू-संत कानून बनाकर राम मंदिर निर्माण का रास्ता प्रशस्त करने की मांग केन्द्र सरकार से करने लगे लेकिन मंदिर निर्माण के लिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले के इंतजार से लोग निराश भी हो रहे हैं।  करीब 40 ऐसे संसदीय क्षेत्र हैं जहां सांसदों और विधायकों में सामंजस्य नहीं है।  केन्द्र व राज्य सरकार की योजनाओं का प्रचार भी नहीं हो पाया।  मंत्रियों की कार्यकर्ताओं से दूरी और कुछ मंत्रियों और उनके निजी स्टाफ के कदाचरण की शिकायतें भी चुनौती हैं। इसे लेकर जनमानस में अच्छा संदेश नहीं गया है। 

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2014 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाने वाला ओबीसी वर्ग सरकार में अपनी पर्याप्त हिस्सेदारी न मिलने से नाराज है।  सामाजिक न्याय समिति की रिपोर्ट लागू हो जाने से उसकी नाराजगी को काफी हद तक दूर हो जाती, लेकिन सरकार ने ऐसा नहीं किया।  लोकसभा चुनाव से पहले सहयोगी अपना दल की अनुप्रिया पटेल और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के ओम प्रकाश राजभर की नाराजगी दूर करना भाजपा के लिए चुनौती है। 

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-2014 में भाजपा ने अपने सहयोगी दलों  समेत 73 सीटें जीतीं
-भाजपा को 42.63 फीसदी, अपना दल को 1.01 फीसदी कुल 43.64 फीसदी मत मिले 
-सपा  22.35 फीसदी मत पाकर पांच सीटें पाई 
-बसपा 19.77 फीसदी मत पाकर एक सीट भी नहीं जीती
-राष्ट्रीय लोकदल को .86 फीसदी वोट मिले
- सपा-बसपा और रालोद को 42.98 फीसदी वोट मिले। यह प्रतिशत भाजपा से केवल .66 फीसदी कम है

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  • Web Title:Mission 2019: BJPs weaknesses in front of the coalition