कूड़े से बिजली प्लांट लगाने की परियोजना पर फैसला आज
Lucknow News - लखनऊ में जैविक और गीले कचरे से बिजली बनाने की परियोजना फिर से शुरू होगी। कुछ कंपनियाँ पीपीपी मॉडल पर नगर निगम से जमीन मांग रही हैं। महापौर का कहना है कि इससे कचरे के निस्तारण में मदद मिलेगी और पर्यावरण को लाभ होगा। हालांकि, विपक्षी पार्षदों ने पारदर्शिता और तकनीकी क्षमता पर सवाल उठाए हैं।

राजधानी में जैविक व गीले कचरे से बिजली बनाने की परियोजना पर फिर काम शुरू होगा। इसके लिए कुछ कम्पनियां आगे आई हैं। वह पीपीपी मॉडल पर लखनऊ में कूड़े से बिजली बनाने का प्लांट लगाने को तैयार हैं। इसके लिए वह नगर निगम से जमीन मांग रही है। नगर निगम ने इसके लिए शनिवार को सदन की बैठक बुलाई है। सदन से मंजूरी मिलने के बाद कूड़े से बिजली बनाने की परियोजना के लिए पांच हेक्टेयर जमीन दी जाएगी। नगर निगम ने शहर में पांच से छह स्थानों पर प्लांट के लिए जमीन चिन्हित की है। महापौर सुषमा खर्कवाल का कहना है कि सदन में केवल वेस्ट टू एनर्जी परियोजना पर ही चर्चा होगी और जो स्थान तय किए जाएंगे, वहीं प्लांट स्थापित किया जाएगा।
कई शहरों में यह मॉडल सफल रहा है, इसलिए लखनऊ में भी इसे लागू करने की तैयारी है। ------------------ गीले कचरे से बने बिजली, कूड़ा निस्तारण भी होगा आसान इस परियोजना के तहत गीले व जैविक कचरे को वैज्ञानिक तरीके से प्रोसेस कर बिजली बनाई जाएगी। इससे शहर में रोजाना निकलने वाले हजारों टन कचरे के निस्तारण की समस्या कम होगी। साथ ही उत्पादित बिजली नगर निगम को रियायती दर पर मिल सकेगी। साथ ही उसे लीज की जमीन का किराया भी मिलेगा। अधिकारियों का दावा है कि इससे लैंडफिल पर दबाव घटेगा और पर्यावरण को भी लाभ होगा। महापौर का कहना है कि यदि परियोजना समयबद्ध तरीके से लागू हुई तो शहर की स्वच्छता व्यवस्था को बड़ा सहारा मिलेगा। हालांकि विपक्षी पार्षदों ने पारदर्शिता, तकनीकी क्षमता और पुराने अनुभवों को देखते हुए सतर्कता बरतने की बात कही है। --- पहले फेल हो चुकी है कूड़े से बिजली पानी की परियोजना लखनऊ में कूड़े से बिजली बनाने की यह पहली कोशिश नहीं है। वर्ष 2003 में हरदोई रोड स्थित बसंत कुंज क्षेत्र में एक बड़ा वेस्ट टू एनर्जी प्लांट स्थापित किया गया था। करीब 88 करोड़ रुपये की लागत से बने इस प्लांट का संचालन एशिया बायो एनर्जी कंपनी को सौंपा गया था। परियोजना के लिए नगर निगम ने 7 एकड़ जमीन 30 वर्ष की लीज पर मात्र एक रुपये वार्षिक दर से दी थी। केंद्र सरकार से 15 करोड़ रुपये का अनुदान भी दिया था। योजना के तहत रोजाना 1200 मीट्रिक टन कचरे से पांच मेगावाट बिजली उत्पादन का लक्ष्य रखा गया था। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के प्रयास से यह परियोजना शुरू हुई थी। लेकिन लेकिन यह महत्वाकांक्षी परियोजना शुरू होने के छह महीने के भीतर ही ठप हो गई। 20 दिसंबर 2004 को प्लांट पर ताला लग गया और कंपनी पर काम छोड़कर भागने के आरोप लगे। कंपनी का दावा था कि उसे समझौते के अनुसार अलग-अलग जैविक और अजैविक कचरा नहीं मिल रहा था, जबकि नगर निगम पर कचरा आपूर्ति में गड़बड़ी के आरोप लगे। -------------- खंडहर व कबाड़ की तरह पड़ा है प्लांट हरदोई रोड बसंत कुंज में यह प्लांट आज भी जर्जर और खंडहर अवस्था में खड़ा है, जो एक असफल प्रयोग की याद दिलाता है। नगर निगम की जमीन भी विवादों में फंसी है। क्योंकि कम्पनी ने इसकी जमीन को गिरवी रखकर प्राइवेट बैंक से बड़ा लोन लिया था। अब देखना होगा कि नई योजना, पुराने अनुभवों से सबक लेकर आगे बढ़ती है या फिर इतिहास खुद को दोहराएगा। फिलहाल नगर निगम सदन की बैठक में शनिवार को इस पर फैसला होगा।
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