
बोले लखनऊ-नौकरी के लिए 17 साल से समायोजन का इंतजार कर रहे कुलियों के रोजागार पर बैटरी कार की मार
Lucknow News - फोटो- रिपोर्ट-शुभ्रांशु शेखर, सौरभ मिश्रा, फोटो-रीतेश यादव कॉमन इंट्रो रेलवे में
फोटो- रिपोर्ट-शुभ्रांशु शेखर, सौरभ मिश्रा, फोटो-रीतेश यादव कॉमन इंट्रो रेलवे में नौकरी के लिए 17 साल से समायोजन का इंतजार कर रहे लखनऊ के विभिन्न स्टेशनों के 350 से अधिक कुलियों के रोजगार पर अब बैटरी कार की मार पड़ रही है। इसके कारण रोजगार पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। बैटरी के कार के कारण उनकी रोजाना की कमाई रसातल में पहुंच गई है, जिससे परिवार तक चलाना मुश्किल हो रहा है। रेलवे की ओर से कागजों पर दी जा रही सुविधा के लिए वह संघर्ष कर रहे हैं। हर तरफ से पड़ रही मार के बावजूद कुली टूट नहीं रहे हैं।
बेहतर कल की आस में वह परिवार को पालने की जद्दोजहद में सीमित आय पर ही जीवन के लिए संघर्ष कर रहे हैं। अपनी मांग को वह बार-बार हर मंच और फोरम पर उठा रहे हैं, लेकिन उपेक्षित होने के कारण उनकी कहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही है। रेलवे की उदासीनता के कारण पूरी जिंदगी कुली के काम में खपाने वालों का बस इतना ही कहना है कि हमें उतना तो रेल मंत्रालय को देना ही चाहिए, जितने के हम हकदार हैं और जितने के लिए वादा किया गया है। मुख्य खबर- चारबाग स्टेशन के मुख्य भवन के बगल में स्थित कुली प्रतीक्षालय में कुल पल के लिए आराम कर रहे कुलियों से जब हिन्दुस्तान ने उनकी समस्या को लेकर बात की तो उनका दर्द छलक आया। एक स्वर में कहने लगे कि पूरी जिंदगी यहां खपा देने के बाद भी रेलवे के अधिकारी हमें हमारा हक नहीं दे रहे हैं। रेलवे की पॉलिसियों के अनुसार जो सुविधाएं हमें दी जानी चाहिए थी, वह अधिकारी सिर्फ कागजों में ही हमें दे रहे हैं। राष्ट्रीय कुली मोर्चा के कोआर्डिनेटर राम सुरेश यादव कहते हैं कि वर्ष 2008 में कुलियों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए गैंग मैन पद पर कुलियों का समायोजन किया गया था। तब पूरे देश में लगभग 42000 कुलियों में से 21,800 कुलियों को समायोजित किया गया था। उसके बाद समायोजन की प्रक्रिया को फिर नहीं कराया गया। इसके लिए पूरे देश के अलग-अलग मंडलों के स्टेशनों पर कार्यरत कुलियों की तरफ से राष्ट्रीय कुली मोर्चा के पदाधिकारी हर मंच और फोरम पर मांग उठाते हैं, लेकिन हमें उपेक्षित वर्ग मान कर हमारी मांगों पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। जो कि हमारे साथ नाइंसाफी है। हमें रेलवे नियमों के अनुसार सुविधाएं भी नहीं दी जा रही हैं। अफसर और इनायत अली कहते हैं कि नौकरी के इंतजार में हमारा जीवन कटता जा रहा है, अब तो बैटरी कार वालों ने सामान ढोना शुरू कर दिया है, जिससे हमारी कमाई भी एक चौथाई रह गई है। ऐसे में परिवार चलाना तक मुश्किल हो गया है। अगर इसी तरह बैटरी कार की संख्या बढ़ती जाएगी तो एक दिन तो हमारा रोजगार ही छिन जाएगे। रोजगार पर संकट, सुविधाएं भी नहीं मिल रहीं- कुली अरुण कुमार यादव कहते हैं कि उन्होंने पिता जी की जगह पर यह काम शुरू किया। वर्ष 2010 में काम करते-करते ओपन यूनिवर्सिटी से स्नातक कर लिया। इस उम्मीद से कि समायोजन होगा तो आगे चलकर वह रेलवे में इंटरनल परीक्षा देते हुए क्लर्क और अधिकारी तक बन जाएंगे। लेकिन, समायोजन की दिशा में कोई पहल न कर के रेलवे उनके सपनों को मार रहा है। कहा कि हम कुलियों को जो सुविधा देने के लिए रेलवे ने कागजों पर वादें किए हैं, उसे तक नहीं दिया जा रहा है। बताया कि रेलवे के नियम में हम लोगों को साल में तीन बार वर्दी देना, मेडिकल सुविधाएं देना, अच्छे प्रतीक्षालय देना आदि शामिल है। इसमें से कुछ नहीं दिया जा रहा है। कुली महेंद्र कहते हैं कि नियम है कि हमारे बच्चों को रेलवे स्कूल में निशुल्क पढ़ाया जाएगा। लेकिन, यहां रेलवे का स्कूल ही नहीं है। बैटरी कार के कारण हमारी आमदनी भी काफी घट गई है। इतना कमा नहीं पाते कि हम कुली अपने बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ा सकें। कहते हैं कि रेलवे स्कूल न होने की दशा में रेलवे को हमारी बच्चों की पढ़ाई के लिए भत्ता तो देना ही चाहिए। हर मौसम झेल कर यात्रियों की मदद करने वाले लाचार- लखनऊ। सर्दी, गरमी, बरसात सहित दिन और रात में भी बिना समय और मौसम देखे काम करने वाले कुली यात्रियों का सामान उठा कर उनकी मदद करते हैं। लेकिन, उनकी मदद करने वाला कोई नहीं। रेलवे अधिकारियों की उदासीनता के कारण वह लाचार हैं। राष्ट्रीय कुली मोर्चा के कोआर्डिनेटर राम सुरेश यादव बताते हैं कि रेलवे का नियम है कि जिस स्टेशन पर 50 से अधिक कुलियों की संख्या है, वहां पर उनके लिए अच्छा प्रतीक्षालय होना चाहिए। वहां पर कुलियों के आराम करने के लिए बेड होना चाहिए, उनके मनोरंजन के लिए टीवी होना चाहिए। स्वच्छ शौचालय के साथ शुद्ध पानी के लिए आरओ की व्यवस्था होनी चाहिए। लेकिन, यहां ऐसा नहीं है। अकेले चारबाग स्टेशन पर ही 244 कुली काम करते हैं। लखनऊ जंक्शन पर यह संख्या 67 है। ऐसे में दोनों ही स्टेशनों पर नियमानुसार प्रतीक्षालय होना चाहिए। कुली अरुण कुमार यादव कहते हैं कि आरक्षण केंद्र के नीचे की ओर से एक हाल है, जिसे कुलियों के लिए प्रतीक्षालय बना दिया गया है। वहां न तो बिस्तर की व्यवस्था है और न ही टीवी है। देर रात को ट्रेन का इंतजार करने वाले कुलियों को वहां अपनी तरफ से चादर बिछा कर आराम करना पड़ता है। मुख्य भवन के पास जो प्रतीक्षालय शेड बना है, वहां पर स्टील की बेंच तो लगा दी गई है, लेकिन सर्दियों से बचाव के लिए उसे घेरा नहीं गया है। कड़कड़ाती सर्दी में जब शीत लहर चलती है तो रात में इसे खुले प्रतीक्षालय में बैठा नहीं जाता। बेंच भी काफी ठंडी हो जाती है। उन्होंने रेलवे अधिकारियों से मानवता के आधार पर कुलियों की सुविधा के लिए कुछ बेहतर इंतजाम करने का अनुरोध किया है। बैटरी कार के चलते दिन-प्रतिदिन घट रही आमदनी- चारबाग और रेलवे जंक्शन पर बैटरी कार के कारण कुलियों की आमदनी दिन-प्रतिदिन घटती जा रही है। दोनों ही स्टेशनों पर नियमत: पांच-पांच बैटरी कार संचालित होना चाहिए। कुलियों के अनुसार ऐसा नहीं है। इनकी संख्या कुछ अधिक है। नियमों को ताख पर रख कर बैटरी कार का संचालन किया जा रहा है, जिसकी सीधी मार कुलियों की आमदनी पर पड़ रही है। कुलियों के नेता राम सुरेश यादव ने बताया कि रेल मंत्रालय, भारत सरकार के पत्र में स्पष्ट निर्देश है कि बैटरी चलित कार का संचालन विशेषकर दिव्यांगजनों, वरिष्ठ नागरिकों और चिकित्सीय रूप से अयोग्य व्यक्तियों के लिए किया गया है। इस सेवा को कुलियों के कार्योँ को प्रतिस्थापित करने के लिए नहीं बल्कि पूरक सेवाओं के रूप में किया जाता है। रेलवे अधिकारियों को पत्र में निर्देशित किया गया है कि बैटरी चलित कार की तेज गति, ओवरलोडिंग और इधर-उधर की जा रही पार्किंग को नियंत्रित करें। रामसुरेश यादव के अनुसार रेल मंत्रालय के इस पत्र का कहीं कोई पालन नहीं किया जा रहा। बैटरी चलित कार अब स्वस्थ्य यात्रियों और उनके सामानों को बेधड़क ढोते हैं। अधिकारी उन्हें रोकते नहीं है, हम लोग विरोध करते हैं तो मारपीट पर उतारू हो जाते हैं। ऐसे में कुलियों को काम नहीं मिल पा रहा। उनकी आमदनी निरंतर घटती जा रही है। स्थिति यह है कि रोज दाल-रोटी खाने लायक कुली कमा पा रहा है। प्रमुख मांग- -वर्ष 2008 में जिस प्रकार से कुलियों का समायोजन उनकी योग्यता के अनुसार रेलवे की नौकरी में किया गया है, उसी प्रकार फिर से समायोजन किया जाए -रेलवे की ओर से सभी कुलियों को बीमा के दायरे में लाया जाए, ताकि किसी अनहोनी पर उनके परिवार की आर्थिक मदद हो सके -रेलवे अस्पताल में इलाज की निशुल्क सुविधा मिलनी चाहिए, इसके लिए रेलवे को रेल मंडलीय अस्पताल के लिए कार्ड बना कर देना चाहिए -बच्चों की शिक्षा के लिए रेलवे के स्कूल में व्यवस्था है, लेकिन यहां रेलवे का स्कूल नहीं है। ऐसे में कुलियों को अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए एक निश्चित भत्ता दिया जाए -वर्ष 1984 के नियमानुसार कुलियों के पारिश्रमिक को महंगाई के अनुसार बढ़ाया जाए -कुली प्रतीक्षालय का निर्माण रेलवे की वर्ष 2019 की पॉलिसी के अनुसार किया जाए। वहां कुलियों के आराम करने के लिए बेड आदि की व्यवस्था की जाए -रेलवे के नियमों के अनुसार साल में एक बार सर्दी और तीन बार गर्मी की वर्दी दी जानी चाहिए ऐसे होती है कुलियों की भर्ती- रेलवे कुलियों की भर्ती की भी एक प्रक्रिया है। स्टेशनों पर कुलियों की संख्या बढ़ाई जाए या नहीं, इसके लिए रेलवे की ओर से सर्वे किया जाता है। आवश्यकता के अनुसार संख्या को लेकर स्थानीय डीआरएम कार्यालय से एक प्रस्ताव बना कर रेलवे बोर्ड को भेजा जाता है। वहां से संस्तुति मिलने के बाद डीआरएम की तरफ से भर्ती के लिए सूचना जारी की जाती है। जिन्हें कुली बनना है वह रेलवे की तरफ से जारी फार्म को भर कर परीक्षा देते हैं। परीक्षा में फिजिकल टेस्ट ही होता है, शैक्षणिक योग्यता की आवश्यकता है। फिजिकल टेस्ट में सबसे पहले दौड़ होती है, उसे पास करने के बाद मेडिकल कराया जाता है। यह भी पास करने के बाद वजन उठाने का टेस्ट होता है, जिसके तहत एक अभ्यर्थी से 40 किलो वजन उठा कर कुछ दूर चलवा कर देखा जाता है। इन सब टेस्ट को पास करने के बाद उन्हें नंबर दिया जाता है, जिससे बिल्ला कहा जाता है। बिल्ला और नियुक्त पत्र लेकर वह संबंधित स्टेशन पर जाता है। वहां स्टेशन निदेशक या अधीक्षक नव नियुक्त कुली का ड्यूटी क्षेत्र निर्धारित करते हैं। वरासत वालों को टेस्ट से छूट- जिनके पिता कुली का काम कर रहे हैं, वह उम्र पूरी करने या अक्षम होने पर यह काम अपने बेटे को सौंपना चाहें तो सौंप सकते हैं। इसके लिए स्टेशन निदेशक/अधीक्षक को लिखित में अनुरोध करना पड़ता है। वहां से अनुरोध पत्र डीआरएम कार्यालय आता है। वहां से संस्तुति मिल ही जाती है। उसके पिता अपना बिल्ला अपने पुत्र को सौंप देता है। उसके बाद पुत्र कुली का काम करना शुरू कर देता है। उसे टेस्ट नहीं देना पड़ता है। कुलियों की बात- रेलवे हम कुलियों को समायोजित कर परमानेंट करे। तब तक बैटरी कार से लगेज ढोने पर रोक लगाई जाए, जिससे कि हम लोग इज्जत से अपने परिवार को पाल सकें। मैं ग्रेजुएट हूं और 2010 में कुली का काम शुरू किया था। अरुण कुमार यादव ठंडी, गर्मी और बरसात हमेशा हम कुली भीड़भाड़ में लोगों के लिए रेलवे स्टेशन पर कार्य करते हैं, लेकिन बीमार होने पर हमारे लिए दवाई के लिए कोई मेडिकल पास या कार्ड नहीं है। बीमारी की स्थिति में दवा कराने में दिक्कत होती है, यहां कोई मेडिकल सुविधा नहीं, मेडिकल कॉलेज जाना पड़ता है। वीरेंद्र कुमार पहले हमें वर्दी मिलती थी, हमारे लिए समायोजन की व्यवस्था थी, अब ना समायोजन है न ही हमें कोई वर्दी मिलती है, हमारे स्वास्थ्य को लेकर भी किसी को नहीं पड़ी। नई सुविधाएं और व्यवस्थाएं तो हमारे लिए हो नहीं रहीं, पुराने लाभ से भी वंचित किया जा रहा। अफसर अली मेरी एक बेटी नर्सरी में पढ़ती है, दूसरी 22 दिन की है। जब तक बैटरी वाहन स्टेशनों पर नहीं आए थे तब तक अच्छी कमाई हो जाती थी और घर भी ठीक से चलता था। अब जो कमाई हो रही है, उससे बड़ी मुश्किल से ही घर चला पा रहे हैं। इनायत अली रेलवे स्टेशनों पर बैटरी वाहनों के आने से हमारी कमाई बंद हो गई है, अब तो परिवार चलाने की मुसीबत आ गई है। मेरे तीन लड़के और दो लड़कियां हैं। यहां स्टेशनों पर घर चलाने तक के पैसे तो मिल नहीं पाते, एक लड़के की शादी की चिंता रहती है। इरफान मेरे पिता केसराज की उम्र ज्यादा होने की वजह से 2008 में रेलवे की नौकरी में समायोजित नहीं किया गया। मैं 2012 से काम कर रहा हूं मेरा भी समायोजन नहीं हुआ। दो लड़कियां एक बेटा और पत्नी समेत पांच लोगों का परिवार है। परिवार चलाने के लिए कर्जा लेना पड़ता है। यहां इतनी भी कमाई नहीं होती है। राघवेंद्र प्रताप सिंह बैटरी वाहन वाले अब लगेज ढोना शुरू कर दिए हैं, लगेज ढो कर हमारा हक मार रहे हैं। सामान ढोने के लिए हम जब तक यात्री से बात करते हैं तब तक वे आकर वाहन से उतरकर सामान लादने लग जाते हैं। बोलने पर लड़ाई को उतर जाते, हम यहां परिवार चलाने के लिए काम कर रहे हैं, मुकदमा नहीं लड़ पाएंगे। महेंद्र बैटरी गाड़ी वृद्ध, गर्भवती और दिव्यांग यात्रियों को लेकर जाने के लिए आई थी, लेकिन यह अब लगेज भी ढो रही, लगेज ढोने से यहां करीब 250 कुलियों का परिवार था, उनका लगेज ढोना अवैध है, लेकिन पता नहीं किसकी शह पर यह वाहन में समान ढो रहे हैं, कोई कार्रवाई नहीं होती। श्याम चंद सुबह नौचंदी एक्सप्रेस से उतरे यात्री से सामान ढोने के लिए बात कर ही रहे थे कि बैटरी कार वाले पहुंच गए। हमें धमका कर बोले कि हम सामान और यात्री ले जाएंगे। प्रतिदिन नए चालक आते हैं, नशा कर के वाहन चलाते हैं। बोलने पर गुंडई करते हैं, लड़ाई पर उतारू हो जाते हैं। हरिराम कोरी पहली बात तो हमें ग्रुप डी की नौकरी मिलनी चाहिए या हमारा समायोजन होना चाहिए। अगर नौकरी नहीं दे पा रहे हैं तो हमपर अत्याचार तो ना करें। बैटरी कार स्टेशनों पर लगा दिया गया है, अब हमारा काम वह छीन रहे हैं। आमीर अहमद बैटरी वाहन रोजगार छीन रहे हैं, वंदेभारत जैसी ट्रेनों में वैसे ही यात्री कम समान लेकर आते हैं, ऐसे में उतरते ही बैटरी वाहन वाले सामान रखकर यात्री भर लेते हैं, हमसे लड़ाई करते हैं। हम लाइसेंस धारी है, लड़ाई नहीं कर सकते, खाने के पैसे तो हमारे पास हैं नहीं, लड़ाई कहां से करेंगे। मो जहीन एक साथ चार-पांच बैटरी वाहन प्लेटफार्म पर उतर देते, भीड़भाड़ हो फिर भी इनकी स्पीड कम नहीं होती है, तेज स्पीड में चलते हैं। कभी किसी के पैर पर, तो किसी को कहीं धक्का लग जाता है, तेज हॉर्न बजा ध्वनि प्रदूषण फैलाते हैं। मोनू कुमार 75 वर्ष से अधिक की उम्र हो गई, 50 वर्षों से कुली का कार्य कर रहा हूं। 2008 में भी ओवरएज की वजह से समायोजन नहीं मिला। अब इस उम्र में ट्रेन आने पर लाइन लगाकर खड़े होकर सामान उठाते लेकिन बैटरी वाहन हमे खड़े नहीं होने देते, हमारी मजदूरी छीन रहे, हमें बाहर चलो बतायेंगे की धमकी देते है। मोतीलाल कोट- कुलियों की सुविधा के लिए रेल मंत्रालय की ओर से लिखित में दिए गए आदेशों का यहां के अधिकारी पालन नहीं कर रहे हैं। जिसके चलते हमें न तो चिकित्सीय सुविधा मिल पा रही है और न ही वर्दी की। हमारे बच्चे अच्छे स्कूलों में पढ़ नहीं पा रहे हैं। हमारे लिए निर्देश के बाद भी नियमानुसार प्रतीक्षालय नहीं बनाए गए हैं। बैटरी कार का संचालन भी नियमों की अवहेलना कर के किया जा रहा है। बैटरी कार हमारा हक मार रहे हैं, जिससे हमारे सामने रोजगार का संकट खड़ा हो रहा है। दाल-रोटी खाने तक पैसे जुटाने मुश्किल हो रहे हैं। राम सुरेश यादव, कोआर्डिनेटर, राष्ट्रीय कुली मोर्चा कोट-सीनियर डीसीएम का आना है-

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