DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

Lok Sabha Elections 2019 : सियासी सरगर्मी बढ़ी, विपक्ष के सुर मिले पर संगत नहीं 

Lok Sabha Elections 2019 : सियासी समर की घोषणा हो चुकी है। मिशन 2019 में सेहरा किसके सिर बंधेगा? यह लाख टके का सवाल है। कोई गठबंधन के सहारे सत्तारूढ़ होने की कोशिश में है तो कोई अपने कामकाज के बूते मतदाता के मन में जगह बनाने की फिराक में है। चुनावी सरगर्मियां जैसे-जैसे आगे बढ़ रही हैं सियासी दल दो खेमों में बंटते नजर आ रहे हैं। एक ओर भाजपा और सहयोगी दल तो दूसरा खेमा कांग्रेस एवं सहयोगी दलों का है। सियासी इतिहास के पर्दे का कोना सरकाएं और झांकें तो अतीत के कई चुनावों में गठबंधन बनाम सत्तारूढ़ दल के बीच हुए संघर्षों की यादें ताजा हो रही है। 

पहले 1971 फिर 1977 और 1989 के चुनाव की तरफ चलते हैं, यह वो दौर था जब पूरा विपक्ष सत्तारूढ़ दल कांग्रेस के खिलाफ एक होकर चुनाव लड़ा। सियासी मुद्दे हर बार अलग-अलग रहे और नतीजे भी। एक बार सत्ता पक्ष काम के बूते दावेदारी कायम रखने में सफल रहा तो दो बार विपक्ष के विरोध की बयार में सत्तारूढ़ दल को बेदखल होना पड़ा। 

1971 में हुए चुनाव को सामने रखते हैं। कांग्रेस के दो फाड़ हुए एक इंडियन नेशनल कांग्रेस (आर) और दूसरा मोरारजी देसाई के नेतृत्व में इंडियन नेशनल कांग्रेस (ओ)। यह हालात तब बने थे जब वर्ष 1969 में इंदिरा गांधी को कांग्रेस से निकाल दिया गया था। 1969 में बैंकों के राष्ट्रीयकरण से लेकर सुधारात्मक फैसलों के साथ ही गरीबी हटाओ के नारे के साथ इंदिरा गांधी लोकसभा चुनाव में उतरीं।  पूरा विपक्ष संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी, स्वतंत्र पार्टी और भारतीय जनसंघ उनके खिलाफ था। इसके बावजूद इंदिरा गांधी पूर्ण बहुमत से जीतीं।

ये बन सकते हैं मुद्दे
सर्जिलक स्ट्राइक, राफेल खरीद मुद्दा, नोट बंदी से रोजगार पर प्रभाव, किसानों को छह हजार रुपये, सबको आवास व उज्ज्वला योजना और सबको शौचालय के साथ ही सबको बिजली।

Lok Sabha Elections 2019 : सोनेलाल की राजनीतिक विरासत को सहेजने में दो खेमों में बंटा परिवार

वर्ष 1977
वर्ष 1977 के चुनाव से पहले देश में इमरजेंसी के अलावा तमाम राजनीतिक घटनाक्रम हुए। इन चुनावों में भी सत्तारूढ़ दल के खिलाफ पूरा विपक्ष था, लेकिन सत्तारूढ़ दल को 1971 जैसी सफलता नहीं मिली। विपक्ष सत्तारूढ़ दल को बेदखल करने में कामयाब रहा। कांग्रेस (ओ), जनसंघ, भारतीय लोकदल, सोशलिस्ट पार्टी ने मिलकर एक ही चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ने का फैसला किया। गठबंधन के नेता मोरारजी देसाई चुने गए। इस गठबंधन को 345 सीटें मिलीं। कांग्रेस के साथ आए राजनीतिक दल 189 सीटों पर सिमट गए। इस चुनावों में कांग्रेस के खिलाफ लोकतंत्र के हनन के आरोप लगे थे और यही सबसे बड़ा मुद्दा था।

वर्ष 1989
वर्ष 1989 में भी सीन कुछ 1977 जैसा था। कांग्रेस से अलग हुए वीपी सिंह के नेतृत्व में चुनाव लड़ा गया। उन्होंने राष्ट्रीय मोर्चे का गठन किया।  कांग्रेस के तत्कालीन प्रधानमंत्री के खिलाफ बोफोर्स चुनाव में मुख्य मुद्दा रहा। जनता दल 143 लोकसभा सीटों के साथ सबसे बड़े विपक्षी दल के रूप में सामने आया और भाजपा व कम्युनिस्ट दलों के सहयोग से वीपी सिंह ने सरकार बनाई। 
मौजूदा हालात में सभी विपक्षी दल एक ही सुर में सत्तारूढ़ दल के विरोध में मुखर हैं। भाजपा को रोकने के लिए सहमत भी हुए हैं। यूपी के संदर्भ में देखें तो सपा-बसपा का गठबंधन विपक्ष को ताकत दे रहा है लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर कोई प्रभावी गठबंधन स्वरूप नहीं ले सका है।  

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:Lok Sabha Elections 2019:opposition compatible is not match