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class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

संसाधन होते तो खेत में ही पकड़ लिया जाता तेंदुआ

-संसाधनों का इंतजाम करने में लग गये घंटो, मेट्रो से मंगाया गया जाल, टेण्ट हाउस से बल्लियां

-मजदूर भी बाहर से बुलाये गये, नगर निगम से मंगाई गई क्रेन

संसाधनों की कमी ही एक वजह थी कि सरसों के खेत में छुपा तेंदुआ पकड़ा नहीं जा सका। उसको पकड़ने के लिये पहले तो जाल ही नहीं था। फिर जब जाल का इंतजाम हुआ तो उसको लगाने वाले लोग कम थे। इसके बीच जब घेरने के लिये जाल कम पड़ गया और उसी में काम चलाना पड़ा तो छुपा हुआ हुआ वहां से भागने में कामयाब हो गया।

कुछ इस तरह से गुरुवार को तेंदुए के रेस्क्यू ऑपरेशन में वन विभाग और लखनऊ जू की टीम के हाथ विफलता लगी। वन अधिकारी भी इस असफलता पर मुंह छुपाते नजर आये। धीरे से कुछ कर्मचारी ये जरूर बोलते नजर आये कि वन विभाग को वन्य जीवों को पकड़ने के लिये पर्याप्त संसाधन रखने चाहियें। अगर जाल आधा किमी या एक किमी तक फैलाने के लिये वन विभाग के पास होता तो जल्दी आता और खेत में छुपे तेंदुए को घेर लिया जाता। असल में जब वन विभाग के पास तेंदुए को पकड़ने का जाल नहीं मिला तो मेट्रो के जाल को मंगाना पड़ा। उसको लाने में ही पांच घंटे बीत गये। इसके बाद बल्लियां और अन्य ससांधन भी इधर-उधर से जुगाड़ करके मंगवाये गये। कुछ जाल और पिंजड़ा कुकरैल से मंगवाया गया। शाम को निगरानी के लिये नगर निगम की क्रेन मंगाई गई। इस चूक पर वन्य जीव विशेषयों का कहना है कि अगर वन विभाग इन संसाधनों के लिये बजट जारी करे और इनको मंगवा ले तो कार्रवाई में कम समय लगेगा। आधा या एक किमी का जाल उनको मुहैया करा दिया जाये और उसको लगाने के संसाधन दे दिये जायें तो इस तरह की कार्रवाई में होने वाली देरी से बचा जा सकता है।

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तेंदुआ पकड़ा गया तो जू अस्पताल जायेगा

वरिष्ठ पशु चिकित्सक डॉ उत्कर्ष शुक्ला ने बताया कि तेंदुए को पकड़ने की कार्रवाई चल रही है। टीम देर रात तक औरंगाबाद में ही डेरा डाले हुए है। रेस्क्यृ ऑपरेशन जारी है। तेंदुआ पकड़ने के बाद उसको जू के अस्पताल ले जाया जायेगा। उसके बाद उसको वन में छोड़े जाने का निर्णय लिया जायेगा।

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