Learn from them: Sadguru teaching children even after retiring - इनसे सीखे : रिटायर होने के बाद भी बच्चों को पढ़ा रहे 'सदगुरु' Video DA Image
9 दिसंबर, 2019|2:36|IST

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इनसे सीखे : रिटायर होने के बाद भी बच्चों को पढ़ा रहे 'सदगुरु' Video

जिनमें समाज के लिए कुछ करने का जज्बा होता है, उम्र का पड़ाव भी उन्हें रोक नहीं पाता। इन्हीं में शामिल हैं गोंडा करनैलगंज के सकरौरा निवासी सदगुरु प्रसाद। जो शिक्षक पद से रिटायर होने के बाद भी उसी स्कूल में छात्रों को निःशुल्क शिक्षा दे रहे हैं। उनके कृतित्व को हर शख्स नमन और सलाम करता नजर आता है।

 ' हिन्दुस्तान' ने देखा कि पूर्व माध्यमिक विद्यालय नगर क्षेत्र बालकराम पुरवा में रिटायर शिक्षक बड़े ही चाव के साथ बच्चों को पढ़ा रहे हैं। प्रधानाध्यापक मोहम्मद रजा ने बताया कि नगर क्षेत्र में संचालित विद्यालयों में अध्यापकों की कमी है। जिससे पठन पाठन का कार्य बाधित होता है। इस विद्यालय में मात्र दो अनुदेशक ही पोस्ट है। 

अध्यापकों की कमी को देखकर शुरू किया विद्यादान का सफर: रिटायर अध्यापक सदगुरु प्रसाद ने बताया कि वे वर्ष 2006 में इसी स्कूल से रिटायर कर दिये गये थे। लेकिन स्कूल से लगाव कम नहीं हुआ था। प्रतिदिन समय से आकर स्कूल का हालचाल लेना उनकी दिनचर्या में था। अध्यापकों की कमी के चलते हो रहे शैक्षिक नुकसान को देखकर वे रिटायरमेंट के बाद सामान्य परिपाटी पर चलते हुए घर नहीं बैठे। और रोज स्कूल आकर क्लास लेने लगे।

हालांकि बढ़ी हुई उम्र में यह कार्य कोई खास सुविधाजनक नहीं था लेकिन वे रोज बिना छुट्टी लिए आ रहे हैं। साथी शिक्षकों का कहना है नौकरी के दौरान भी वे बच्चों के बहुत करीब रहे। वे लगातार बच्चों की बेहतरी के लिए काम करते रहे, चाहे कमजोर बच्चों को अतिरिक्त वक्त देना हो या फिर किताब कॉपियों से मदद करनी हो। सीमित कमाई के बावजूद वे हमेशा अपनी जेब से मदद करते रहे। अब रिटायर होने के बाद भी वे रोज बिना वेतन लिए भी नियमित शिक्षकों की तरह स्कूल आ रहे हैं।

लोगों के लिए बन रहे मिसाल: शिक्षा को व्यवसाय मानकर देश में लाखों लोग करोड़ो रुपये कमा रहे है। ऐसे में सदगुरु शरण का यह कदम उन तमाम लोगों के लिए एक सीख की तरह है जो शिक्षा को धर्म की बजाय व्यवसाय समझते है। आदर्श अध्यापक रवि प्रताप सिंह कहते है कि स्कूल के अन्य शिक्षकों को इनसे प्रेरणा लेनी चाहिए जिससे आने वाले समय में गुरु-शिष्य पंरपरा को बेहतर बनाया जा सके। डाक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णनन ने इसी तरह के शिक्षकों की कल्पना भी की थी।

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