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30 अक्तूबर, 2020|1:13|IST

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लेडी आनंदी

परछाईं से निकलकर अपने वजूद को पाने की जंग 'लेडी आनंदी'

लखनऊ। वरिष्ठ संवाददाता

रंगमंच की एक कलाकार...जो अपने ही दादाजी के भूत से परेशान है और हर बार जब वह मंच पर होती है तो उस भूत से पीछा छुड़ाकर अपने असल किरदार में आने की जद्दोजहद कर रही है।

भूत, यानी उसके दादाजी, तो 19वीं सदी के मंजे हुए रंगमंच कलाकार थे और मंच पर महिला किरदारों को जीवंत करने में महारथ रखते थे।

...अब हर बार यह अदाकारा जब मंच पर होती है, दादाजी का भूत उसपर हावी होता है और वही करवाता है जो वह चाहता है। इस कलाकार की दो लड़ाइयां हैं...पहली, बेहद सहज अंदाज में खुद में एक औरत को उतारने वाले दादाजी से मुक्ति और दूसरी, खुद को मंच पर औरत साबित करने की...।

दस्तावेजों पर आधारित मराठी रंगमंच की यह बेहतरीन कहानी लखनऊ के दर्शकों के लिए लेकर आई थीं अनुजा घोषालकर। सोमवार को अंतरराष्ट्रीय बौद्ध संस्थान में इस नाटक का मंचन किया गया। भारत, स्वीडन व जर्मनी में इसके अब तक लगभग 40 शो हो चुके हैं। अंग्रेजी व मराठी भाषा के इस नाटक का सबसे मजबूत पक्ष था, ढेरों दस्तावेजों और दास्तानों के साथ अनुजा का एकल अभिनय, जो कि महिला व पुरुष दोनों का किरदार निभा रही थीं। अनुजा ने दर्शकों के सामने बड़ा सवाल भी रखा कि बिना सबूतों के हम इतिहास की कहानियां, सिर्फ फिक्शन के आधार पर कैसे सुना सकते हैं। या यूं कहें कि जहां कोई प्रमाण नहीं होता वहां कल्पना ही इतिहास को बताने का सबसे बेहतर माध्यम है। 'लेडी आनंदी' नाटक को यूं कहा जा सकता है कि यहां इतिहास की खोज खत्म होती है और परफॉर्मेंस शुरू होती है। इसकी एक और खास बात थी कि यह बिना निर्देशक का नाटक था। प्रस्तुति खत्म होने के बाद नाटक से जुड़े सवाल-जवाब का सत्र भी रखा गया था।