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केपी सक्सेना

-उर्दू अकादमी में केपी सक्सेना पर गोष्ठी और उनके लिखे नाटक 'खिलजी का दांत' का मंचन

लखनऊ। वरिष्ठ संवाददाता

'ईद मंगल को पड़ गई होगी, होली जुमे को को जल गई होगी, होगी कुछ बात वरना बस्ती में, चील दावत पे क्यों गई होगी...'। व्यंग्य को कुछ इसी तरह कलम की नोंक पर रखने वाले मशहूर लेखक, व्यंग्यकार, स्क्रिप्ट लेखक केपी सक्सेना को याद करते हुए रविवार की शाम बिम्ब कला केन्द्र की ओर से उप्र उर्दू अकादमी में एक संगोष्ठी 'केपी एक रंग अनेक' आयोजित की गई।

साथ ही यहां राजेश अरोड़ा 'शलभ' के काव्य संग्रह 'फुर्सत नहीं है' का विमोचन भी हुआ। संगोष्ठी के बाद शाहजहांपुर से आए कलाकारों ने यहां केपी सक्सेना के लिखे नाटक 'खिलजी का दांत' का मंचन भी किया। दूरदर्शन के कार्यक्रम अधिशासी आत्म प्रकाश मिश्रा के संचालन में शुरू हुई गोष्ठी के पहले वक्ता प्रख्यात हास्य कवि सूर्य कुमार पांडेय थे। उन्होंने मंचों पर केपी सक्सेना के साथ हुए अनुभवों को साझा करते हुए कहा कि वह केपी से साल 1966 में मिले थे। बतौर छात्र उन्होंने केपी के लिखे एक नाटक का मंचन भी किया मगर फिर उसके बाद दोबारा मुलाकात 1975 में कवि सम्मेलनों के दौरान हुई। केपी उन चंद लेखकों में से थे जो मुख्य रूप से गद्य लिखते थे लेकिन कवि सम्मेलनों में बुलाए जाते थे। वरिष्ठ रंगकर्मी डॉ. अनिल रस्तोगी ने अपना संस्मरण सुनाया कि वर्ष 1965-66 में उन्हें सीडीआरआई में एकांकी करनी थी, जिसके लिए वह केपी से मिले और फिर यह केपी की आत्मीयता थी कि आखिरी तक संबंध रहे। डॉ. रस्तोगी ने बताया कि जब आशुतोष गोवारिकर उनके जोधा अकबर के संवाद लिखवाने के लिए लखनऊ आए और कहा कि जोधा के लिए शुद्ध हिन्दी और अकबर के लिए खालिस उर्दू के संवाद चाहिए तो केपी ने उसे चुनौती की तरह लिया व करके दिखाया। वरिष्ठ व्यंग्यकार गोपाल चतुर्वेदी ने यहां कहा कि हम दोनों एक दूसरे को जानते थे लेकिन मिले नहीं थे। एक शादी की जगह ढूंढते ढूंढते हम दोनों टकरा गए। मैं श्रीलाल शुक्ला से मिलने जाता था और वहीं थोड़ा आगे केपी रहते थे। अक्सर मुझे टोकते कि यहां तक आते हो तो श्रीलाल के यहां कॉमा रखो और यहां फुल स्टॉप किया करो। गोष्ठी के मुख्य वक्ता उप्र हिन्दी संस्थान के पूर्व अध्यक्ष उदय प्रताप सिंह ने यहां कहा कि केपी की काबिलियत थी कि उन्होंने मिर्जा जैसे काल्पनिक पात्र को जीवित कर दिया। लोग पूछते थे कि मिर्जा वाकई हैं या सिर्फ कल्पना हैं। उन्होंने जिस झटके से मंच और सिनेमा छोड़ा वो उनके आत्मविश्वास का प्रतीक है।

हड़प्पा हाउस में बिका 'खिलजी का दांत'

गोष्ठी के बाद यहां केपी सक्सेना के लिखे नाटक 'खिलजी का दांत' का मंचन किया गया। शमीम आजाद के निर्देशन में शाहजहांपुर के कलाकारों ने नाटक प्रस्तुत किया। 'दुकान हड़प्पा हाउस, नौकर का नाम फाह्यान तो आप जरूर कोलम्बस होंगे...।', 'खिलजी का दांत एक ही था, हमारे पास नादिर शाह की बत्तीसी है, आप उसे ले लीजिए...'। ऐसे ही तमाम व्यंग्य से भरे संवादों ने दर्शकों को ठहाके लगाने पर मजबरू कर दिया। नाटक में प्रमुख रूप से अमित हरिश्चंद्र, ऋषिकांत, प्रभा मौर्य, रीना राठौर, अभिषेक कुमार, अनुराग, सूरज, सुशील और अंकित ने अभिनय किया।

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