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एचआईवी संक्रमित दम्पति के भी होते हैं स्वस्थ बच्चे

पाजिटिव मांओं के नेगेटिव बच्चे।

कुदरत का यह चमत्कार अक्सर देखा जाता है। पाजिटिव होने के बाद मां बनी महिलाओं के बच्चे भी कई बार नेगेटिव होते हैं। पाजिटिव मांओं के ऐसे बच्चों पर रिपोर्ट।

डॉक्टरों से बात: कैसे होता है यह चमत्कार।

(प्रसव से पहले कौन सी दवाएं होती हैं इस्तेमाल।)

- पता चलते ही नियमित दवा खाने से एचआईवी संक्रमित के होते हैं निगेटिव बच्चे

- सरकारी अस्पतालों में ही कराएं डिलीवरी, दाई या घर पर गर्भवती के प्रसव से बचें

लखनऊ। निज संवाददाता

ब्लड प्रेशर की बीमारी से पीड़ित व्यक्ति एक गोली दवा खाने से ही स्वस्थ रहकर सारे काम करता है। ठीक इसी तरह से एचआईवी (एड्स) का इलाज भी सिर्फ एक गोली के नियमित खाने से ही होता है। एचआईवी संक्रमण का पता चलने के बाद से एआरवी थेरेपी की दवा मरीज खाकर बेहतर जिंदगी जी सकता है। इस दवा से ही मरीज में लगातार संक्रमण का खतरा कम होता है। एचआईवी संक्रमित माताओं के ज्यादातर बच्चे स्वस्थ (एचआईवी निगेटिव) होते हैं। एचआईवी आनुवांशिक बीमारी नहीं है, इसलिए एचआईवी संक्रमित महिला के बच्चे के स्वस्थ होने की संभावनाएं बहुत अधिक रहती है।

गर्भवती महिला का रखा जाता है ख्याल

केजीएमयू के डॉ. सौरभ पॉलीवॉल बताते हैं कि एचआईवी संक्रमित महिला और पुरुष की शुरू से ही एआरवी (एंटी रेटरो वॉयरल) थेरेपी देकर दवा दी जाती है। रात में खाने के एक घंटे बाद यह एक गोली खानी होती है। गर्भवती महिलाओं को भी निरंतर यह दवा खाना होता है। प्रसव के बाद भी महिला की दवा चलती रहती है। जबकि प्रसव के बाद हुए शिशु को कुछ समय के लिए नेवरापेन दवा दी जाती है। इससे शिशु में तमाम प्रकार के संक्रमण से बचाव होता है। भविष्य में भी बच्चों को एचआईवी होने का खतरा कम होता है। बच्चों की एक्टिविटी पर भी कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

दाई या घर में न कराएं प्रसव

डॉ. पॉलीवॉल बताते हैं कि दाई या घर में प्रसव कराने से एचआईवी संक्रमण का खतरा काफी बढ़ जाता है। क्योंकि दाई या घर में प्रसव होने पर एचआईवी या खून की जांच लोग नहीं कराते हैं तो उन्हें पता ही नहीं चलता है कि वह एचआईवी संक्रमित हैं या नहीं। इसलिए लोगों को सरकारी अस्पतालों, सेंटरों पर ही गर्भवती होने पर इलाज और जांच कराना चाहिए। वहां पर एचआईवी समेत खून की तमाम जांच हो जाती है। ऐसे में बच्चे के एचआईवी संक्रमित होने का खतरा इलाज शुरू हो जाने से कम हो जाता है। सरकारी अस्पताल में डिलीवरी के लिए डॉक्टर, पैरामेडिकल स्टॉफ प्रशिक्षित होता है। वहां तमाम प्रकार की सुविधाएं होती हैं।

कई चरण में होता है इलाज

एचआईवी संक्रमित मरीजों का कई चरणों में इलाज होता है। इन चरणों के इलाज का तभी प्रयोग करना पड़ता है, जब संक्रमित मरीज दवा खाने में लापरवाही करता है। दवा में लापरवाही बरतने पर एआरवी थेरेपी के बाद दूसरी स्टेज का एआरवी प्लस थेरेपी शुरू की जाती है। किसी गर्भवती महिला के पॉजिटिव होने पर दवा खाने से उसमें एचआईवी का वॉयरल लोड कम होता जाता है। इससे गर्भावस्था के दौरान बच्चे पर उसका असर कम पड़ता है।

काउंसलिंग से मिलती है मदद

शरणम् संस्थान के नजीर खान ने बताया कि काउंसलिंग से एचआईवी मरीजों, उनके परिवारीजनों, रिश्तेदारों को काफी जागरुक किया जाता है। दवाओं के साथ प्रिवेंशन पैरेंट टू चाइल्ड ट्रांसमिशन (पीपीटीसीटी) के तहर एचआईवी संक्रमित लोगों को तमाम जानकारी दी जाती है। सभी एआरवी सेंटर, सरकारी व महिला अस्पतालों, मेडिकल कॉलेजों में गर्भवती महिलाओं की काउंसलिंग की। गर्भवती महिलाओं के खानपान, वैक्सीनेशन का खास ख्याल रखा जाता है।

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