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मौत के घेरे में पैदा हुई जिंदगियों को छुपानी पड़ती है बीमारी

मौत का घेरे में पैदा हुईं जिंदगियां। पाजिटिव मांओं के उन बच्चों पर रिपोर्ट, जो पाजिटिव पैदा हुए। उनकी जिंदगी में कैसी-कैसी दुश्वारियां। डॉक्टर कैसे संभालते हैं उनकी सेहत और परिवार कैसे सामना करता है चुनौती का। लखनऊ। निज संवाददाता हमारा देश दिनों दिन नई तकनीकी और उन्नति की दिशा में बढ़ रहा है। पर, समाज में अभी भी बहुत सी भ्रांतियों से कुछ लोग अपनी बीमारी को छुपाकर जी रहे हैं। इनमें से एचआईवी संक्रमित लोगों की संख्या सबसे अधिक है। सबसे ज्यादा बुरी स्थिति तो उनकी है जिन एचआईवी संक्रमित दम्पति के बच्चे भी इस संक्रमण के खतरे में जन्म ले लेते हैं। माता-पिता तो किसी तरह से समाज में अपनी बीमारी को छुपाकर घुट-घुटकर जीवन व्यतीत कर रहे होते हैं। बच्चे के संक्रमण होने से वह और टूट जाते हैं। उन्हें खुद के साथ अपने बच्चे की इस बीमारी को भी हर जगह छुपाना पड़ता है। नहीं बदल रही मानसिकता एचआईवी संक्रमित लोगों के जीवन को सुदृढ़ बनाने के लिए काम कर रही शरणम् संस्थान संस्था के प्रोजेक्ट हेड नजीर अहमद खान ने बताया कि समाज में लोगों की मानसिकता में बहुत ज्यादा बदलाव नहीं हो रहा है। जागरुकता के लिए काफी प्रयास किए जा रहे हैं। अभी भी समाज में लोग एचआईवी संक्रमित, उनके परिवार के प्रति बहुत नकारात्मकता रखते हैं। यही वजह है कि उनको अपनी बीमारी और पहचान को छुपाना पड़ता है। बहुत ही कम लोग ऐसे हैं जो इस बीमारी से पीड़ित होने पर भी अपना नाम, पहचान और बीमारी को नहीं छुपाते हैं। स्कूल में दाखिले तक की दिक्कत शांति निकेतन संस्था की सिस्टर रश्मि ने बताया कि एचआईवी संक्रमित लोगों से समाज में अभी भी सौतेला और निराशाजनक व्यवहार लोग करते हैं। जबकि काफी जागरुकता फैलाई जा रही है कि यह बीमारी छुआछूत की नहीं है। एचआईवी संक्रमित दम्पति के निगेटिव बच्चे होने पर भी स्कूल में दाखिले में दिक्कत तब हो जाती है, जब उनमें से कोई भी अपनी इस बीमारी को उजागर कर देता है। सामाजिक तिरस्कार की बेदर्दी केजीएमयू के मेडिसिन विभाग के डॉ. सौरभ पॉलीवॉल बताते हैं कि अभी भी लोग एचआईवी संक्रमित लोगों को सामाजिक रूप से तिरस्कृत करते हैं। जबकि जगह-जगह जागरुकता फैलाने का सरकारी और गैर सरकारी संस्था, विभागों द्वारा निरंतर प्रयास किया जा रहा है। लोगों को इस बीमारी के प्रति अपनी सोच बदलने की बहुत ज्यादा जरूरत है। उन्हें चाहिए कि वह एचआईवी संक्रमित लोगों के साथ ज्यादा से ज्यादा समय गुजारें। इससे उनके मन की स्थिति को जानने के साथ उन्हें यह भी पता चलेगा कि यह बीमारी छुआछूत की नहीं है। 90 फीसदी निगेटिव बच्चे डॉ. पॉलीवॉल के मुताबिक एचआईवी संक्रमित महिला के गर्भवती होने की जानकारी मिलने पर शुरू से ही दवाएं दी जाती हैं। इससे 90 फीसदी बच्चे एचआईवी निगेटिव ही पैदा होते हैं। शुरू से ही इलाज किए जाने से एचआईवी पॉजिटिव पैदा होने का खतरा काफी कम हो गया है। पर, ऐसे बच्चों के स्कूल में दाखिले के समय भी माता-पिता की बीमारी की जानकारी साझा नहीं की जाती है। डॉक्टरों के अलावा जागरुकता के लिए काम कर रही संस्थाओं के सदस्य एचआईवी संक्रमित लोगों की हर तरह से मदद करते हैं। वह आर्थिक, सामाजिक पहचान हो या कुछ भी।

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