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लखनऊ हिन्दू-मुस्लिम एकता के बीच पुल बने है हिन्दू मर्सियाख्वान

अब्बास रिजवी,लखनऊ। Published By: Deep
Fri, 14 Sep 2018 01:01 PM
 हिन्दू-मुस्लिम एकता के बीच पुल बने है हिन्दू मर्सियाख्वान

इंसान को बेदार तो हो लेने दो, हर कौम पुकारेगी हमारे हैं हुसैन। ऐसा सिर्फ हिन्दुस्तान में हो सकता है। जहां इमाम हुसैन को खिराजे अकीदत पेश करने वाले सिर्फ शिया समुदाय के ही नहीं बल्कि हर धर्म के लोग हैं। इसमें शायर संजय मिश्र ‘शौक’ जो लखनऊ की गंगा जमुनी तहजीब की मिसाल बने हुए हैं,  वक्याते कर्बला पढ़ने के बाद वह करीब 30 साल से इमाम हुसैन की शान में मर्सिये लिख और पढ़ रहे हैं। बाकायदा मोहर्रम में इनको मर्सियाख्वानी के लिए अजाखानों में बुलाया जाता है। ये मिम्बर पर बैठकर इमाम हुसैन शान में अश्हार पढ़ते हैं। उलमा की तरीके से अजादार उनको दाद भी देते हैं। 

बहते हुए पानी पर लिखा है अब्बास
यक्ता है, यगना है, जुदा है अब्बास, इस्लाम के मकसद की बका है अब्बास, दरिया से वफाओं का पता मत पूछो, बहते हुए पानी पर लिखा है अब्बास। अय्यामें अजा में संजय मिश्र ‘शौक’ ने जब मिम्बर से ये बंध अजादारों के सामने पेश किए तो उन्होंने उनका स्वागत नारे हैदरी से किया। संजय बताते हैं कि वह हैदराबाद, दिल्ली, मुम्बई से लेकर देश के हर कोने में जाकर अपने कलाम पेश कर चुके हैं। लखनऊ के छोटे इमामबाड़े, नाजमियां, बड़ा इमामबाड़े समेत कई अजाखानों में जाकर मर्सियाख्वानी कर चुके हैं। संजय बताते हैं कि लोग उनको उतना ही सम्मान देते है जितना वह एक उलमा को देते हैं। संजय मिश्र ‘शौक’ करीब 30 साल से उर्दू व हिन्दी शायरी से जुड़े हुए हैं। वह अरबी, फारसी, उर्दू, हिन्दी, इंगलिश, तमिल और सैराकी ‘पाश्तो-ये भाषा पाकिस्तान के एक प्रांत में बोली जाती है’जैसी भाषाओं के ज्ञाता है। संजय मिश्र अब तक दस हजार से अधिक अश्हार लिख चुके हैं। संजय बताते हैं कि वाक्याते कर्बला पढ़ने के बाद से ही उनको इमाम हुसैन और अहलेबैत पर अश्हार कहने का शौक जागा है। 

मुश्किल कला है मर्सिया कहना 
मीर अनीस को हिन्दुस्तान का सबसे बड़ा मर्सियाख्वान कहा जाता है। उनके लिखे मर्सिये आज भी हिन्दुस्तान और पाकिस्तान में पढ़े जा रहे हैं। किसी के दुख और शोक को अश्हार के जरिए पेश करने को मर्सिया कहा जाता है। मर्सियाख्वान वजीर हसन बताते हैं कि ये कला बहुत ही मुश्किल है। अब मर्सिया कहने वाले बहुत कम ही शायर बचे हैं। ये कला खत्म होती जा रही है। मीर अनीस और मिर्जा दबीर ने इमाम हुसैन पर कर्बला के मैदान में जो जुल्म और सितम हुए। उनको मर्सिये में बहुत ही करीने से पीरोया है। ऐसे में संजय मिश्र ‘शौक’ अपने मर्सियों से हिन्दू-मुस्लिम एकता का पुल बने हुए हैं। शायरा डॉ नसीम निखहत कहती है कि कर्बला के वाक्या को बयान करना आसान नहीं है। इसके लिए वाक्ये कर्बला पढ़ना जरुरी है। इसमें संजय मिश्र ‘शौक’ के कर्बला पर कहे अश्हार काफी सराहे जाते हैं। 

एक हिन्दू होकर कर्बला पढ़ना बड़ी बात है
मर्सियाख्वान सुनीता झिंगरन कहती है कि मैँ अभी मोहर्रम में कई बार संजय मिश्र ‘शौक’ के लिखे मर्सिये पढ़ चुकी हूं। कर्बला को मर्सिये के जरिए बयान करना बहुत बड़ी बात है। एक हिन्दु ब्राह्म्ण होकर संजय मिश्र  ‘शौक’ ये काम कर रहे है। ये बड़े गर्व की बात है।  

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