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गुरु पूर्णिमा 2018: वे गुरु जिनकी बातें आज भी दिखा रही रास्ता

guru purnima 2018

गुरू: जिनकी बातें आज भी दिखा रही रास्ता

लखनऊ। 'गुरु बिन ज्ञान न उपजै, गुरु बिन मिलै न मोष...गुरु बिन लखै न सत्य को, गुरु बिन मिटैं न दोष...'। कबीरदास के इस दोहे में गुरु की महत्ता का पूरा सार समाहित है। न सिर्फ किताबी ज्ञान, बल्कि जीवन के सकारात्मक सबक भी तभी मिलते हैं, जब आपके पास किसी गुरु का सानिध्य हो। अवसर गुरु पूर्णिमा का है तो शहर की कुछ जानीमानी हस्तियों से उनके गुरु के बारे में बात हुई...वो गुरु जिनके दिए सबक ने इन हस्तियों के जीवन के मायने बदल दिए और आज भी जब कभी अंधेरे इन्हें घेरते हैं तो उन्हीं गुरुओं की बातें रोशनी बनकर रास्ता दिखाती हैं...गुरु महिमा की कहानी, इन्हीं शख्सियतों की जुबानी...

स्वरूप कुमारी बक्शी, पूर्व शिक्षामंत्री उप्र

लेखिका, समाजसेविका

(श्रीश्री ज्योतिर्मयी मां ने सिखाया वेदांत)

जीवन के 100वें बसंत में प्रवेश कर चुकी हूं और जब इस एक सदी की यात्रा को पलटकर देखती हूं तो ऐसे कई नाम व चेहरे आंखों के सामने से गुजरते हैं जिन्होंने मेरे जीवन को सार्थक किया। मेरे जीवन और लेखन में आध्यात्म का बड़ा योगदान है। आध्यात्म से यह जुड़ाव हुआ दिल्ली में श्रीश्री ज्योतिर्मयी माता के सानिध्य में रहकर। उनके पास तकरीबन 20 साल रहकर मैंने वेदांत, शंकर भाष्य व ग्रंथ पढ़े। जितना वक्त उनके साथ रही, वह जीवन का सबसे स्वर्णिम काल कहूं तो गलत नहीं होगा। आज भी उनकी बताई बातें, मेरे जीवन का सूत्रवाक्य हैं और मुझे रास्ता दिखा रही हैं।

प्रो. निशि पांडेय, अंग्रेजी विभाग,

लखनऊ विवि

(मासी की चिट्ठियां आज भी दिखाती हैं रास्ता)

मेरे जीवन में स्कूल-कॉलेज के अध्यापक तो कई रहे मगर जो असल में गुरु बनीं वह थीं मेरी मासी डॉ. सुशीला पांडेय। 60 के दशक में वह पटना मेडिकल कॉलेज में शिक्षक थीं और वहां की हॉस्टल वॉर्डन भी थीं। आजीवन अविवाहित रहीं और आत्मनिर्भर भी। कक्षा 6 तक मैं मासी के ही पास रहकर पढ़ी। उन्हें देखकर औरत की ताकत का अहसास होता था। मैं उन्हीं से प्रेरणा लेकर शिक्षक बनी। जब उनके पास से वापस लखनऊ आ गई तब मासी हर हफ्ते चिट्ठियां भेजती थीं जिनमें ढेर सारी प्रेरणादायक बातें होती थीं। तब वो केवल पत्र थे मगर अब उनका महत्व समझ में आता है। जब भी अंधेरों में घिरती हूं तो मासी की चिट्ठियां रोशनी दिखाती हैं।

अरविंद चतुर्वेदी, आईपीएस

(सुब्बाराव जी बने जीवन के सारथी)

यूं तो मेरे पिता प्रो. शैलनाथ चतुर्वेदी ने यज्ञोपवीत के साथ मुझे गुरुमंत्र दिया था, उस लिहाज से वह मेरे गुरु हुए मगर जीवन में जो सबसे बड़े प्रेरणास्रोत बने वह हैं एसएन सुब्बाराव। उन्होंने जिस तरह चंबल में डाकुओं का समर्पण कराया और गांधी शांति मिशन को आगे बढ़ाया, उसे देखकर मैंने उनसे काफी कुछ सीखा है। उनके कई कैम्प किए और पुलिस सेवा में आने के बाद महोबा व लखनऊ में उनके कैम्प करवाए। लगभग 90 वर्ष उनकी उम्र हो रही है और आज भी जिस तरह से वह सक्रिय हैं, उसे देखकर बहुत सकारात्मकता मिलती है। वह युवाओं को प्रेरित करने के लिए एक गीत गाते हैं जो कुछ यूं है, 'करें राष्ट निर्माण, बनाएं मिट्टी से अब सोना...'। यह गीत मेरे जीवन का प्रेरणास्रोत बना हुआ है।

आत्मप्रकाश मिश्र, कार्यक्रम अधिशासी

दूरदर्शन लखनऊ

(संगीत की शिक्षक ने भरा जीवन में संगीत)

बात 70 के दशक की है, शायह 1971 से 1975 का वक्त। मैं सरस्वती शिशु मंदिर प्रतापगढ़ में पढ़ता था। वहां शिशु भारती सभा होती थी और वहीं से मैंने बोलने की कला सीखी। हमारी संगीत की शिक्षिका थीं ऊषा चटर्जी। उनकी बातें मुझे तब भी प्रेरणा देती थीं और आज भी बहुत कुछ सिखाती हैं। शिशु मंदिर का सूत्रवाक्य था, 'स्वयमेव मृगेन्द्रता', जिसका अर्थ है स्वयं में सिंह जैसे बनो। इसी सूत्रवाक्य ने जीवन में हमेशा आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा दी। शिशु मंदिर में ही शिक्षक बद्री विशाल तिवारी और ओमप्रकाश शर्मा भी थे जिन्होंने बहुत कुछ सिखाया। झोपड़ी में वह स्कूल चलता था, बारिश होती थी तो छत टपकती थी लेकिन सबसे मीठी यादें वहीं से जुड़ी हुई हैं।

डॉ. पूर्णिमा पांडेय, कथक कलाकार

अध्यक्ष, उप्र संगीत नाटक अकादमी

(लालबाग कॉलेज से मिला जीवन का सूत्रवाक्य)

कथक की बात करूं तो पं. मोहनराव कल्याणपुरकर और विक्रम सिंह ने नृत्य शिक्षा दी। प्रसाद रूप में पं. लच्छू महाराज, पं. शम्भू महाराज, पं. बिरजू महाराज से भी सीखा। मगर जीवन के मूल सबक की बात करूं तो वह मिला लालबाग गर्ल्स कॉलेज में। यहां का सूत्रवाक्य था, 'व्ही रिसीव टु गिव' और मेरे जीवन का सूत्रवाक्य भी बन गया। आज भी इसी फलसफे पर चल रही हूं कि जो ज्ञान मैंने लिया, उसे दूसरों को दे सकूं। इसके बाद आईटी कॉलेज पहुंची तो वहां हिन्दी के शिक्षक थे डॉ. शंभुनाथ बहुगुणा। उनका प्रभाव मेरे जीवन पर खूब रहा। हिन्दी की शिक्षा और भाषा से लगाव उन्हीं की देन है। बाकी जीवन में कदम कदम पर ऐसे लोग मिलते रहे और आज भी मिलते रहते हैं जिनसे कुछ न कुछ सीखने को मिलता रहता है।

प्रो. सदानंद गुप्ता, अध्यक्ष

उप्र हिन्दी संस्थान

(हिन्दी के शिक्षक ने दिया साहित्य का संस्कार)

मैं 10वीं में पढ़ रहा था। वहां मेरे हिन्दी के शिक्षक थे बेनी राय। वही मेरे प्रेरणास्रोत रहे। लिखने-पढ़ने की सलाहियत, साहित्य का संस्कार उन्हीं से मिला। पढ़ाई के अलावा उनसे एक किस्म का आत्मीय लगाव रहा या यूं कहें कि वह मेरे श्रद्धा के केन्द्र रहे। शब्दों का ज्ञान, नाटकों से रुचि भी उन्हीं के कारण हुई। स्कूल में सरस्वती कला केन्द्र की स्थापना हुई थी और वहां मेरे गुरुजी सरस्वती पूजा करवाते थे, साथ ही नाटक भी कराए जाते थे। उसी माहौल में रहकर मेरे जीवन की दिशा तय हो गई थी। इसके बाद गोरखपुर में गीता वाटिका पहुंचा तो वहां अध्ययन की नई यात्रा शुरू हुई। बाद में कई लोग मिले तो समय-समय पर प्रेरित करते रहे।

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