
फैज और मुक्तिबोध का साहित्य दिशावाहक का काम करता है
Lucknow News - लखनऊ में जन संस्कृति मंच द्वारा आयोजित 'यादें फैज व मुक्तिबोध' कार्यक्रम में सभी ने सहमति जताई कि फैज और मुक्तिबोध का साहित्य आज की तुलना में कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। मुख्य वक्ता कौशल किशोर ने दोनों कवियों के संघर्ष और उनके साहित्य के महत्व पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम में कविताएं भी प्रस्तुत की गईं।
लखनऊ, कार्यालय संवाददाता जन संस्कृति मंच (जसम) की ओर से रविवार को एमबीए लाइब्रेरी, जगत नारायण रोड के सभागार में यादें फैज व मुक्तिबोध कार्यक्रम का आयोजन हुआ। जिसमें सभी ने माना कि फैज जैसे शायर व मुक्तिबोध जैसे कवि पहले की अपेक्षा आज कहीं ज्यादा जरूरी और प्रेरक हैं। इनका साहित्य दिशावाहक का काम करता है। अध्यक्षता सईदा सायरा ने की। मुख्य वक्ता कवि और जसम के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कौशल किशोर ने कहा कि जहां फैज अहमद फैज इंकलाबी शायर हैं, वही मुक्तिबोध वैचारिक कवि हैं। अपनी वैचारिक प्रखरता की कीमत दोनों को चुकानी पड़ी है। दोनों का संघर्ष शोषण के विरुद्ध है।
फैज की शायरी के अनेक रंग हैं। व्यवस्था बदलाव व बग़ावत का अगर एक रंग है, तो मोहब्बत का भी काफी चटक रंग है। श्री किशोर ने कहा कि फैज ने समाजवादी व्यवस्था के लिए संघर्ष किया। उन्हें दमित भी किया गया। जेल में रखा गया। लेकिन सत्ता उन्हें अपने रास्ते से हटाने में सफल नहीं हुई। उन्होंने हम देखेंगे ऐसी नज्म लिखी जिसकी आज भी गूंज है। इकबाल बानो को इस नज़्म को गाने पर पाबंदी भी लगाई गई। उन्होंने कहा कि फैज सत्ता के दमन का शिकार हुए तो मुक्तिबोध अपने जीवन काल में उपेक्षित हुए। उनका कविता संग्रह चांद का मुंह टेढ़ा है उस वक्त आया, जब वे अपने संग्रह को देख और पढ़ पाने में असमर्थ थे। मुक्तिबोध की कविता अंधेरे में हिंदी कविता में मील का पत्थर है। वे जिस अंधेरे की पड़ताल करते हैं, वह आजादी के बाद की पूंजीवादी व्यवस्था का अंधेरा है। कार्यक्रम के दूसरे सत्र में इलाहाबाद से आई रूपम मिश्रा ने अपनी करीब दर्जन भर कविताएं सुनाईं। संचालन नगीना निशा ने किया।

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