पार्किंसन में जब दवाएं बेअसर हों तो खास सर्जरी से मरीज को राहत
Lucknow News - पार्किंसंस से पीड़ित मरीजों के लिए डीप ब्रेन स्टिमुलेशन (डीबीएस) एक प्रभावी और आधुनिक विकल्प बन गया है। यह तकनीक दिमाग के कुछ हिस्सों में इलेक्ट्रोड लगाकर असामान्य संकेतों को नियंत्रित करती है। लखनऊ में आयोजित वाकथान में डॉ. रूचिका टंडन ने इस प्रक्रिया के लाभ बताए, जिससे मरीजों की जीवन गुणवत्ता में सुधार हुआ है।

डीबीएस तकनीक से ऑपरेशन कर मरीजों को राहत दवाओं से न थमने वाले पार्किंसंस में डीबीएस बना नई उम्मीदपार्किंसंस जागरूकता पर वाकथान हुआलखनऊ, वरिष्ठ संवाददाता।पार्किंसंस से जूझ रहे ऐसे मरीज, जिन पर दवाओं का असर कम हो जाता है। पूरी तरह बंद हो जाता है। उन मरीजों में डीप ब्रेन स्टिमुलेशन (डीबीएस) एक कारगर और आधुनिक विकल्प हो सकता है। इसमें दिमाग के कुछ खास हिस्सों में छोटे-छोटे इलेक्ट्रोड (तार) लगाए जाते हैं। ये इलेक्ट्रोड एक डिवाइस से जुड़े होते हैं, जो सीने के पास लगाया जाता है। यह डिवाइस हल्के इलेक्ट्रिकल सिग्नल भेजता है, जो दिमाग के असामान्य संकेतों को नियंत्रित करता है।
यह जानकारी पीजीआई न्यूरोलॉजी विभाग की डॉ. रूचिका टंडन ने दी।पार्किंसंस डिजीज एंड मूवमेंट डिसऑर्डर सोसाइटी की लखनऊ शाखा की ओर से वॉकथॉन का आयोजन किया गया। वॉकाथान के बाद डॉ. रूचिका टंडन ने मरीज व तीमारदारों को अहम जानकारी दी। डॉ. रूचिका टंडन ने कहा कि डीबीएस एक सर्जिकल प्रक्रिया है। जिसमें दिमाग के विशेष हिस्सों में इलेक्ट्रोड लगाए जाते हैं। ये इलेक्ट्रोड असामान्य सिग्नल्स को नियंत्रित कर कंपन, जकड़न और धीमी गति जैसी समस्याओं को कम करने में मदद करते हैं। पीजीआई में इस अत्याधुनिक तकनीक का उपयोग कर अब तक 10 मरीजों को राहत मिल चुकी है जिससे उनकी जीवन गुणवत्ता में सुधार हुआ है।उन्होंने कहा कि जिन पार्किंसन के मरीजों पर दवाएं असर नहीं करती हैं। कंपकंपी, जकड़न या धीमी गति की परेशानी बढ़ जाती है। ऐसे मरीजों में डीबीसी तकनीक अधिक कारगर है। नई तकनीक से इलाज के बाद मरीजों में कंपन और जकड़न में कमी आ सकती है। मरीज को चलने-फिरने में सुधार हो सकता है। दवाओं पर निर्भरता कम हो सकती है।पीजीआई की डॉ. अमृता मोर ने पार्किंसन रोग के मोटर और नॉन-मोटर लक्षणों के बारे में जानकारी दी। सोसाइटी के प्रमुख न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. प्रदीप गुप्ता ने बताया कि पार्किंसंस मरीजों और उनके परिजनों के लिए निशुल्क आशा की पाठशाला का आयोजन किया जाता है। डॉ. गुप्ता के बताया कि पार्किंसंस के मरीज न केवल शारीरिक, बल्कि मानसिक तनाव का भी सामना करते हैं। ऐसे में इस तरह की पहल उन्हें नई उम्मीद और हौसला देती है।
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