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चौंकाने वाले नतीजों के लिए चर्चित रहा है गोरखपुर

पहले विधानसभा सीट पर चुनाव। इसके बाद मेयर का चुनाव और अब लोकसभा उपचुनाव। गोरखपुर में यह तीन चुनाव अलग-अलग वक्त में हुए और जनता ने ऐसा निर्णय दिया जिसके बारे में न हारने वालों ने सोचा होगा और ना ही जीतने वाले ने।

बरसों पहले यूपी के मुख्यमंत्री रहे टीएन सिंह...। जब वह मुख्यमंत्री बने तो किसी सदन के सदस्य नहीं थे। वह कांग्रेस संगठन में थे। सीएम बने रहने के लिए उन्होंने एमएलसी बनने के बजाए विधानसभा उपचुनाव लड़ना बेहतर समझा और गोरखपुर की मनीराम सीट से उपचुनाव लड़े। यह सीट महंत अवैद्यनाथ के लोकसभा सदस्य बनने के कारण रिक्त हुई थी। कोई सीएम चुनाव लड़ रहा हो तो कोई सोच भी नहीं सकता था कि वह हार जाएंगे लेकिन इंदिरा कांग्रेस के प्रत्याशी रामकृष्ण द्विवेदी ने उन्हें करारी मात दे दी। उस चुनाव में प्रचार करने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी रामकृष्ण द्विवेदी का प्रचार करने मनीराम क्षेत्र गईं थीं। हारने के कारण टीएन सिंह को सीएम की कुर्सी छोड़नी पड़ी। चुनाव हारने के कारण टीएन सिंह का इस बात के लिए मजाक बना कि वह अपना चुनाव ‘मैनेज नहीं कर पाए लेकिन वह दौर दूसरा था।

इसके बाद बरसों बाद गोरखपुर मेयर का चुनाव हुआ। गोरखपुर की जनता फिर चौंकाने वाले नतीजे देने के लिए तैयार हो रही थी लेकिन सभी दल जनता के मूड को भांप नहीं पाए। सियासी दलों के खिलाफ नाराजगी तो थी ही साथ ही भाजपा व उनके विरोधी खेमे की सियासती भी तेज थी। उस वक्त बतौर निर्दलीय खड़ी हुईं किन्नर आशा देवी को जनता ने मेयर के लिए भारी मतोद से जिता दिया। ....और अब गोरखपुर की जनता ने बरसों बाद गोरखपुर की सांसदी भाजपा को न देकर सपा को जिस तरह सौंप दी, वह अब चौंकाने वाली ही मानी जा रही है।

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