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छठ बातचीत

दिवाली से ज्यादा छठ की रौनक

मीनाक्षी पाठक

यह दूसरा मौका है जब मैं छठ का व्रत करूंगी और सच कहूं तो हमारे घर पर दिवाली से ज्यादा रौनक छठ की होती है। पूजा करने के लिए मुझे तो नए कपड़े लेने ही होते हैं, बच्चों से लेकर बड़ों तक, सबके लिए नए कपड़े आते हैं। सब मिलकर खूब तैयारियां करते हैं। पर्व की पूरी जिम्मेदारी सासू मां ने ले रखी है, वह निर्देश देती है और परिवार के बाकी सदस्य उनका अनुसरण करते हैं।

44 साल से जारी तपस्या

मालती पाठक

इस बार मेरा यह 44वां छठ का व्रत होगा। पांच दशक बीतने को हैं लेकिन छठ के व्रत में कभी कोई दिक्कत नहीं आई। यूं तो कभी-कभार तबीयत ऊपर नीचे हो भी जाए लेकिन छठी मइया की कृपा से इन चार दिनों में पूरी तरह स्वस्थ रहती हूं। घर के आसपास ज्यादातर लोग बिहार के ही हैं तो हम यहीं पार्क में अर्घ्य देने की व्यवस्था कर लेते हैं और सब साथ मिलकर पूजा करते हैं।

जब जो मांगा, छठ मइया ने दिया

राधा मिश्रा

पिछले 20 साल से छठ का व्रत कर रही हूं और मां की कृपा भी भरपूर मिल रही है। जब-जब जो कुछ मांगा, उन्होंने दिया है। इसलिए हर बार इस व्रत में आस्था कुछ और बढ़ जाती है। व्रत कठिन है लेकिन कभी कोई समस्या नहीं हुई बल्कि उत्साह दोगुना हो जाता है। इस बार भी तैयारियां शुरू हो चुकी हैं और रविवार से व्रत शुरू भी हो जाएगा।

हर शुभ काम पर भरी कोसी

सुजाता रानी

17-18 साल हो गए यह व्रत करते हुए। रिवाज यह है कि जब भी कोई शुभ काम घर में होता या कोई मन्नत पूरी हो तो छठ पर उसके नाम की कोसी भरी जाती है। मैंने अपनी पहली कोसी अपने बेटे के जन्म पर भरी थी। उसके बाद से छठ मइया ने कोसी भरने के कई मौके दिए हैं। कामना यही है कि हर साल कुछ अच्छा होता रहे और कोसी भरने के मौके मिलते रहें।

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