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सिर्फ पुरस्कार पाने के लिए नहीं लिखना चाहिए

- राज्य कर्मचारी साहित्य संस्थान की ओर से पुरस्कार एवं सम्मान समारोह का आयोजन - 23 साहित्यकारों को मिला साहित्यिक पुरस्कार वर्ष 2018- 2019- राजधानी के पांच साहित्यकारों को मिला सम्मान लखनऊ। निज संवाददाता प्रशासनिक पद पर रहते हुए लेखन का काम करना बहुत मुश्किल होता है। लेखन की कोई सीमा नहीं होती मगर पद पर रहते हुए मर्यादाओं व पद की गरिमा के अंदर रहकर लेखन करना पड़ता है जो बहुत ही मुश्किल कार्य होता है। यह बातें प्रमुख सचिव संस्कृति, भाषा जितेंद्र कुमार ने कही। रविवार को राज्य कर्मचारी साहित्य संस्थान की ओर से पुरस्कार एवं सम्मान समारोह वर्ष 2018- 2019 का आयोजन हिंदी संस्थान के यशपाल सभागार में किया गया। जिसमें मुख्य अतिथि के रूप में प्रमुख सचिव संस्कृति, भाषा जितेंद्र कुमार मौजूद रहे। इस मौके पर सीनियर आईएएस और संस्थान के अध्यक्ष डा. हरिओम की पुस्तक 'तितलियों का शोरÓ का भी विमोचन हुआ। विशिष्टïअतिथि कथाकार शिवमूर्ति ने सरकारी सेवारत लेखकों के सामने की चुनौतियों पर चर्चा की। समारोह में संस्था के महामंत्री डॉ दिनेशचंद्र अवस्थी, डॉ. रश्मिशील, विजय प्रसाद त्रिपाठी, हिंदी संस्थान की संपादक डॉ. अमिता दुबे समेत तमाम साहित्यसेवी मौजूद रहे। समारोह की अध्यक्षता डॉ. हरिओम ने की। इस मौके पर 21 हजार धनराशि वाला ओम प्रकाश चतुर्वेदी गीत पुरस्कार नरेंद्र भूषण को व 11 हजार धनराशि वाला रमन लाल अग्रवाल पुरस्कार डॉ श्लेष गौतम को दिया गया। इज्जत दूसरों को अपनाने से मिलती हैवहीं समारोह में विशिष्ट अतिथि के रूप में सचिव चिकित्सा शिक्षा विभाग मुकेश मेश्राम ने कहा कि अपने पद पर रहते हुए रचना धर्म निभाना मुश्किल काम है। यह बिल्कुल ऐसा है जैसे दो धुरी के बीच संतुलन बना के रखना। उन्होंने कहा कि आज के समय में लेखक और उसके लेखन पर जिम्मेदारी ज्यादा बढ़ गई है। पाठकों को जोड़ना आज महत्वपूर्ण हो गया। उन्होंने कहा कि आजकल सेवा बाजार का दौर आ गया जिसमें लोग दूसरो से लिखवाकर अपने नाम से पुस्तक विमोचन करवा रहे है यह एक चुनौती है। आज के समय में शब्दों की भाषा और विचारों की स्वंतत्रता बहुत जरूरी है। वहीं इस मौके पर समारोह की अध्यक्षता कर रहे डॉ. हरिओम ने कहा कि जिसके लिए पुरुस्कृत किया गया उसकी जिम्मेदारी अब आप पर ज्यादा है। आज के समय में जो कुछ भी कही लिखता है वो कोई न कोई बंधन को तोडता है। लेकिन साहित्य का एक अपना अनुशासन है उसके दायरे में रहकर लिखना चाहिए। साहित्य विचारों को जन्म देता है इसलिए सिर्फ पुरस्कार पाने के लिए नहीं लिखना चाहिए। प्रेमचंद कहते थे कि साहित्य मशाल है आज स्याह ताकते ज्यादा मजबूत हो रही है मशाल की ताकते मजबूर हो रही है इसका भी हमें ही ख्याल रखना होगा। राजधानी के साहित्यकारों को मिला सम्मान राज्य कर्मचारी साहित्य संस्थान उप्र की ओर से उप्र हिंदी संस्थान के यशपाल सभागार में आयोजित पुरस्कार एवं स मान समारोह में 23 साहित्यकारों को एक लाख राशि वाले साहित्यिक पुरस्कार को चार विभिन्न श्रेणी में दिया गया। जिसमें राजधानी के पांच साहित्यकार शामिल है। शिव सिंह सरोज पुरस्कार- हरी प्रकाश हरिअमृत लाल नागर पुस्कार- बालेंदु कुमार द्विवेदीश्यामसुंदर दास पुरस्कार- डॉ. माला शिल्पकार जोश मलिहाबादी पुरस्कार- डॉ जमील दोषीअमीर खुसरो पुरस्कार- डॉ. जमाल अख्तर मिर्जा असदउल्ला खां गालिब पुरस्कार- मनीष शुक्ल

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