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मनुष्य में ईश्वर के प्रति तीन प्रकार की होती है श्रद्धा

रामकृष्ण मठ निरालानगर में आयोजित प्रवचन के दौरान शुक्रवार को स्वामी मुक्तिनाथा नन्द जी महाराज ने भगवद् गीता के 17 वें अध्याय की व्याख्या करते हुए कहा कि पहले श्लोक में ही अर्जुन ने भगवान से पूछा कि जो व्यक्ति शास्त्र विधि नही मानते हुए श्रद्धा पूर्वक पूजन करते हैं उनकी निष्ठा किस प्रकार की होती है। उन्होंने कहा कि जो मनुष्य शास्त्रविधि परित्याग करके केवल अपने श्रद्धानुसार कर्म करते हैं उनकी त्रिविध निष्ठा होती है। मनुष्यों को अपने स्वभाव के अनुरूप तीन प्रकार की श्रद्धा होती है-सात्विकी, राजसी एवं तामसी । जिसकी जैसी श्रद्धा होगी उसका विकास भी वैसा ही होगा। इस निष्ठा की पहचान उनके पूजा के प्रकार से मिल जाता है।सात्विक मनुष्य देवताओं की पूजा करते हैं जिससे उनके जीवन में अग्रगति होता है। उनका मन क्रमशः शान्ति, प्रकाश, आनन्द एवं पवित्रता से पूर्ण हो जाता है। स्वामी मुक्तिनाथा नन्द जी महाराज ने कहा कि राजसी स्वभाव वाले मनुष्य अपनी कामना पूर्ति व दूसरों का विनाश करने के लिए प्रयास करते हैं एवं उनका मन सर्वदा क्रिया शील, चंचल एवं प्रतिक्षण-वर्तमान कामनाओं से भरेरहने के कारण दुःख पूर्ण रहता है और तामस मनुष्य अपने पितरों को छोड कर अन्य मरे हुये प्रेतां तथा भूत योनियों में चले गए भूतों का पूजन करते हुए अधोगति को प्राप्त होते हैं। यद्यपि अपने पितर भी प्रेत योनियों में हैं तथा उनके पूजन करने में कोई हानि नही होती बल्कि पितृ-ऋण पूर्ण करने के लिए पितृलोक-प्राप्ति तथा कल्याण होता है।

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