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127 साल पुरानी पटरी पर आज आखिरी ट्रेन

127 साल पुरानी पटरी पर आज आखिरी ट्रेन

ब्रिटिश कालीन 127 साल पुराने मैलानी-पीलीभीत रेलखंड पर अंतिम ट्रेन बुधवार को रवाना होगी। बुधवार दोपहर डेढ़ बजे आखिरी ट्रेन पीलीभीत के लिए जाएगी। इसी के साथ इस रूट पर छोटी लाइन की ट्रेनें एक इतिहास बनकर रह जाएंगी।

ब्राडगेज के लिए पीलीभीत-मैलानी इस रेलखंड पर ब्लाक लेने की 30 मई की अंतिम तारीख तय की गयी है। इस रेलखंड पर ब्राडगेज की व्यवस्थाओं को परखने के लिए इसी महीने की शुरुआत में जीएम राजीव अग्रवाल के दौरे के बाद यह घोषणा की गई। यह रेल खंड 127 साल पुराना है। तब से इस पर ट्रेनें दौड़ रही हैं। वर्ष 1891 में पहली अप्रैल को रुहेलखंड एंड कुमायूं रेलवे के अंतर्गत गोलाकर्णनाथ से पीलीभीत तक मीटरगेज लाइन का निर्माण कार्य पूरा हुआ और इस पर ट्रेनों का संचालन भी शुरू हो गया। तब से 127 साल का लंबा वक्त गुजर गया और इस रेलखंड पर बिना कोई विशेष बदलाव के यात्रियों का सफर बदस्तूर जारी है।

इस रेलखंड पर तब से दौड़ रही छोटी रेल लाइन ट्रेनें देश के विकास का भी आईना हैं। लोगों का मानना है कि अंग्रेजों ने तब देश के इस बेहद ही पिछड़े क्षेत्र में रेल लाइन बिछाकर को ट्रेन चला दी पर आजादी के 71 साल बीत जाने के बाद इंडियन रेलेवे इस मीटरगेज लाइन को ब्राडगेज में नहीं बदल सका है। इसको लेकर भले ही कवायद वर्षों से चल रही है पर अब जाकर यह कवायद पूरी होने की कगार पर है। इस रेलखंड को ब्राडगेज में बदलने का काम रेलवे की ही कार्यदायी संस्था आरवीएनएल (रेल विकास निगम लिमिटेड) के पास है। यह संस्था लखनऊ से पीलीभीत तक गेज कंवर्जन का काम कर रही है। कार्यदायी संस्था की ओर इस रेलखंड पर ब्राडगेज के लिए ब्लाक लेने से पहले कराए जाने वाले निर्माण कार्य समय से पूरे नहीं कराए गए। इससे इस रेलखंड पर ब्लाक लेने का पूर्व निर्धारित कार्यक्रम कई बार टल भी गया। बुधवार को अंतिम ट्रेन पर सवारी करने और छोटी लाइन को भरे मन से विदाई देने को लोग उत्सुक हैं।

ट्रेन बंद और सबसे कट गए मैलानी वाले: पीलीभीत जाने वाली ट्रेनें बुधवार को बंद हो जाएंगी। गोला, लखनऊ जाने के लिए ट्रेनें पहले से बंद हैं। ऐसे में मैलानी के लोग दुनिया से कट गए हैं। मैलानी में यातायात का कोई साधन नहीं है। यहां से सबसे करीब भीरा, पलिया, बाकेगंज और गोला है। पर वहां जाने के लिए भी अपना साधन होना चाहिए। यात्रियों की मजबूरी का फायदा उठाते हुए डग्गामार इस इलाके में दौड़ रहे हैं, लेकिन रोडवेज जैसी सुविधा अब तक पूरी नहीं हो सकी है। मैलानी एक व्यापारिक कस्बा है। ट्रेन बंद होने का साफ असर यहां के कारोबार पर पड़ेगा। हालांकि जिम्मेदार इन हालातों से बेपरवाह हैं।

ये तारीखें बनीं मील का पत्थर: 15 नवम्बर 1886-लखनऊ से सीतापुर के लिए चली पहली ट्रेन15 अप्रैल 1887-सीतापुर से लखीमपुर के लिए ट्रेन चली19 दिसम्बर 1887-लखीमपुर से गोला के बीच ट्रेन चलाई गईएक अप्रैल 1891-गोला से पीलीभीत तक ट्रेन चलाई गई

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  • Web Title:The last train on the 127-year-old track today