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21 जनवरी, 2020|10:42|IST

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कभी चिराग बनकर जो लैम्पपोस्ट करते थे रोशन, अब हो गए कबाड़, 132 साल बाद अब खत्म होने लगा इनका अस्तित्व

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शताब्दी पहले जिस लैम्पपोस्ट की रोशनी देखकर पहली बार खीरी में मीटरगेज की ट्रेन ने कदम रखा था। लगभग 132 साल बाद मीटरगेज सिमटने के साथ ही अंग्रेजों के जमाने के लैम्प पोस्ट कबाड़ में पहुंच गए। इनको लखीमपुर जिले से इज्जतनगर के लिए भेजा जा रहा है। 15 अप्रैल 1887 को ऐशबाग से लखीमपुर के बीच पहली मीटर गेज की ट्रेन पहुंची थी। इस ट्रेन को सिग्नल देने के लिए तेल से जलने वाले लैम्पपोस्ट दिखाकर ही स्टेशन पहुंचाया गया था।

भारत के अंग्रेजों से आजादी मिलने के बाद भी इन लैम्पपोस्ट के सहारे ही ट्रेनों को सिग्नल दिखाकर रवाना किया जाता रहा। 20वीं सदी में इनकी जगहों पर बैट्री से चलने वाले सिग्नल आए। इसके बाद कई बार हुए बदलाव में इनको पूरी तरह से हटाकर नयी व्यवस्था लागू कर पूरा बदलाव कर दिया गया। मीटरगेज भी 15 अक्टूबर 2016 को चलन से बाहर हो गई। वर्ष 2019 में इसकी जगह पर ब्रॉडगेज की ट्रेन सेवा शुरू कर दी गई। इसके बाद मीटरगेज में काम आने वाले सभी सामान को कबाड़ में शामिल की जिले से इज्जतनगर भेजा जा रहा है। 

इस तरह से लैम्पपोस्ट का होता रहा उपयोग

मीटरगेज की ट्रेन की शुरुआत में ट्रेन आने से पहले स्टेशन से एक कर्मचारी लैम्पपोस्ट लेकर करीब डेढ़ किलोमीटर पैदल जाकर आउटर सिग्नल पर लैम्पपोस्ट को दिखाता था। साथ ही वहीं से स्टेशन मास्टर को सकेत देकर ट्रेन रवाना की जाती थी। साथ ही ट्रेन के लिए लाइन बदलने को लगे लोहे के हत्थों को हाथों से बदला जाता था। 

आजादी के बाद इनके रखने की शुरू हुई व्यवस्था

रेलवे के पुराने कर्मचारियों ने बताया कि आजादी के कई साल बाद आउटर पर सिग्नल लगाए गए। इसके बाद भी इनमें शाम के समय स्टेशन का स्टाफ सीढ़ी पर चढ़कर इनमें लैम्पपोस्ट को रखता था। इनको देखकर ही अंधेरे में ट्रेन स्टेशन पर पहुंचती थी। 

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  • Web Title:Once illuminated by lamp who used to be illuminated now became junk after 132 years now their existence started to end