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21 जनवरी, 2021|10:54|IST

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खीरी के बाढ़ प्रभावित किसान अब उगाएंगे हरा सोना

खीरी के बाढ़ प्रभावित किसान अब उगाएंगे हरा सोना

खीरी जिले में हर साल नदियां भारी तबाही मचाती हैं। पांच तहसीलों के सैकड़ों गांवों के किसान हर साल बाढ़ का दंश झेलते हैं। नदिया फसलें तबाह कर देती हैं। इससे किसानों की माली हालत खराब हो जाती है। अब इन बाढ़ व कटान प्रभावित गांवों के किसान हरा सोना मानी जाने वाली बांस (बम्बू) की खेती करेंगे। बांस की खेती से न सिर्फ कटान रुकेगा बल्कि बाढ़ का पानी भरने से उनकी फसल भी बर्बाद नहीं होगी। तीन साल में फसल तैयार हो जाएगी। इसके बाद 35 से 40 सालों तक फसल कटती रहेगी। इसमें किसानों को न तो पानी लगाना पड़ेगा न ही खाद आदि का इंतजाम करना पड़ेगा। हर साल फसल कटेगी और इसका नकद मूल्य भी मिलेगा।

बांस की खेती को हरा सोना बताया जाता है। बाढ़ प्रभावित गांवों के किसानों के लिए ये खेती वरदान साबित होगी। बाढ़ प्रभावित गांवों के किसानों की हर साल एक फसल बाढ़ की भेंट चढ़ जाती है। इससे किसानों को भारी नुकसान होता है। बाढ़ प्रभावित गांवों के किसानों को अब परम्परागत खेती से हटाकर ऐसी खेत करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है जिसमें लागत कम मुनाफा ज्यादा हो। खास बात ये है कि बाढ़ का पानी भरने पर भी यह फसल खराब नहीं होगी।

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दो ब्लॉकों से हो रही शुरुआत

सीडीओ अरविन्द सिंह ने इसके लिए विशेष कार्ययोजना तैयार की है। बांस की खेती की शुरुआत नकहा ब्लॉक की ग्राम पंचायत खानीपुर और रेहरिया खुर्द से होने जा रही है। यह दोनों गांव बाढ़ व कटान प्रभावित हैं। ज्यादातर किसानों को बमुश्किल एक फसल ही मिल पाती है। इन गांवों के किसानों से सम्पर्क कर सीडीओ ने बांस की खेती करने के लिए प्रेरित किया है। सीडीओ ने नकहा ब्लॉक सभागार में किसानों के साथ बैठक की। सीडीओ ने बताया कि एक हेक्टेयर में बांस के 1500 से 2500 तक पौधे लग जाएंगे। इनको किसान खेत पर भी लगा सकता है। इसके अलावा खलिहान, पशु बाड़े के पास भी लगा सकता है। उनको बम्बू की खेती के फायदे बताए। सीडीओ ने बताया कि इन किसानों को 30 सितम्बर को सीतापुर में उस स्थान पर ले जाया जाएगा जहां के किसान बांस की खेती करते हैं। वहां इनको प्रशिक्षण दिलाया जाएगा।

बांस की खेती से होंगे कई फायदे

-बांस की खेती भूमि का कटान रोकती है। पानी व खाद की जरूरत नहीं होती है। खेतमेड़ के झगड़े भी इससे समाप्त होते हैं। हर साल फसल बोवाई, खाद, निराई, गोड़ाई आदि भी नहीं करना होता है। फसल बड़ी होने के बाद छुट्टा जानवरों के चरने का नुकसान भी नहीं होगा। आपदा में भी नुकसान नहीं होता। शुरुआत के दो सालों में तो थोड़ी देखभाल की जरूरत होती है बाद में यह फसल अपने आप बढ़ती जाती है और हर साल इसकी कटाई होती रहती है। एक बार फसल बोने के बाद करीब 40 साल तक हर साल कटाई होती है। नकहा के दो गांवों में शुरुआत कराने के बाद इसको पलिया, धौरहरा, रमियाबेहड़, ईसानगर, फूलबेहड़, बिजुआ आदि के बाढ़ प्रभावित गांवों में भी खेती शुरू कराई जाएगी।

मुम्बई, दिल्ली, कर्नाटक के व्यापारी खरीदेंगे

-बांस की खेती की शुरुआत होने के बाद किसानों का एफपीओ बनाया जाएगा। बांस की खेती हरा सोना इसलिए बोली जाती है क्योंकि हर साल कटती है और इसकी नकद बिक्री होती है। मुम्बई, दिल्ली, कर्नाटक आदि के व्यापारी तुरंत खरीद लेते हैं। करीब 50 किसानों को जोड़कर फेडरेशन बनाया जाएगा। इसके सभी पदाधिकारी किसान ही होंगे। किसानों का अपना फेडरेशन होगा तो बिक्री के लिए बाजार भी मिलेगा। बांस का उपयोग कास्मेटिक, इंडस्ट्रीज में होता है। कांस्ट्रक्शन के लिए उपयोग में लाया जाता है। इतना ही नहीं बांस का अचार भी बनाया जाता है। बांस की खेती पड़ोसी सीतापुर, हरदोई जिले में होने लगी है। वहां के किसानों को फायदा मिला है जिससे इसका दायरा भी बढ़ रहा है।

मुम्बई, दिल्ली, कर्नाटक के व्यापारी खरीदेंगे

-बांस की खेती की शुरुआत होने के बाद किसानों का एफपीओ बनाया जाएगा। बांस की खेती हरा सोना इसलिए बोली जाती है क्योंकि हर साल कटती है और इसकी नकद बिक्री होती है। मुम्बई, दिल्ली, कर्नाटक आदि के व्यापारी तुरंत खरीद लेते हैं। करीब 50 किसानों को जोड़कर फेडरेशन बनाया जाएगा। इसके सभी पदाधिकारी किसान ही होंगे। किसानों का अपना फेडरेशन होगा तो बिक्री के लिए बाजार भी मिलेगा। बांस का उपयोग कास्मेटिक, इंडस्ट्रीज में होता है। कांस्ट्रक्शन के लिए उपयोग में लाया जाता है। इतना ही नहीं बांस का अचार भी बनाया जाता है। बांस की खेती पड़ोसी सीतापुर, हरदोई जिले में होने लगी है। वहां के किसानों को फायदा मिला है जिससे इसका दायरा भी बढ़ रहा है।

खेती हरा सोना इसलिए बोली जाती है क्योंकि हर साल कटती है और इसकी नकद बिक्री होती है। मुम्बई, दिल्ली, कर्नाटक आदि के व्यापारी तुरंत खरीद लेते हैं। करीब 50 किसानों को जोड़कर फेडरेशन बनाया जाएगा। इसके सभी पदाधिकारी किसान ही होंगे। किसानों का अपना फेडरेशन होगा तो बिक्री के लिए बाजार भी मिलेगा। बांस का उपयोग कास्मेटिक, इंडस्ट्रीज में होता है। कांस्ट्रक्शन के लिए उपयोग में लाया जाता है। इतना ही नहीं बांस का अचार भी बनाया जाता है। बांस की खेती पड़ोसी सीतापुर, हरदोई जिले में होने लगी है। वहां के किसानों को फायदा मिला है जिससे इसका दायरा भी बढ़ रहा है।

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  • Web Title:Flood-affected farmers of Kheri will now grow green gold