
जनहित के ख्याल से राजपरिवार ने लगाई थी चीनी मिल, लोग कब्जा करते गए जमीन
संक्षेप: Kushinagar News - पडरौना चीनी मिल, जिसकी स्थापना 1920 में हुई थी, अब अवैध कब्जों से जूझ रही है। सरकारी लापरवाही के कारण लोग चीनी मिल की जमीन पर कब्जा कर चुके हैं। वर्तमान डीएम के नेतृत्व में राजस्वकर्मियों की टीम ने पैमाइश शुरू की है, जिसमें कई लोगों द्वारा पुराने नंबरों में हेरफेर करने के तथ्य सामने आए हैं।
कुशीनगर। पडरौना राजघराने ने जनहित के ख्याल से साल 1920 में पडरौना में जो चीनी मिल लगाई थी, सरकारी तंत्र की शिथिलता की वजह से लोग कब्जा करते गए। चीनी मिल के डोंगे में गन्ना पड़े 13 वर्ष बीत गए, जिम्मेदारों की सुस्ती या लापरवाही के चलते इसके अधिकांश हिस्से पर लोगों ने अवैध रूप से कब्जा कर लिया है। मौजूदा डीएम के ध्यान देने और इसे पुन: चलाने के लिए गठित राजस्वकर्मियों की टीम द्वारा जमीन की पैमाइश में चौंकाने वाले तथ्य सामने आ रहे हैं। वे यह कि बहुत से लोगों ने चीनी मिल की जमीन के पुराने नंबरों में हेरफेर कर गलत तरीके से नए नंबरों से अपने नाम करा लिया है।

इसकी वजह से मौजूदा समय में पडरौना चीनी मिल की जमीन काफी घट गई है। यदि सही ढंग से निष्पक्ष पैमाइश हो गई तो बहुत से लोगों के मकान जद में आएंगे। ऐसे लोगों को जमीन के पैमाइश की जानकारी होते ही दिन का सुकून और रातों की नींद उड़ गई है। कानपुर शुगर वर्क्स लिमिटेड की पडरौना चीनी मिल की स्थापना यहां के रायबहादुर कुंवर प्रताप नारायण सिंह ने वर्ष 1920 में कराई थी। वर्ष 1997-98 और 2011-12 में पेराई करके बंद होने के बाद लोगों ने इसकी जमीन पर कब्जा करना शुरू कर दिया। इस चीनी मिल के नाम से पडरौना और बगल के जंगल विशुनपुरा में मिलाकर 165.47 एकड़ जमीन है, लेकिन इसकी जमीन की देखरेख ठीक ढंग से न होने के कारण लोगों ने अंधाधुंध कब्जा करना शुरू कर दिया और अब काफी हिस्से पर लोगों ने अपना घर या व्यवसायिक प्रतिष्ठान बनवा लिए हैं। इस चीनी मिल को पुन: चलवाने के लिए एक बार फिर से डीएम महेंद्र सिंह तंवर की तरफ से प्रयास शुरू किया गया है। उनके आदेश पर सदर तहसीलदार ने राजस्वकर्मियों की नौ सदस्यीय टीम गठित की है, जिसे पूर्व में जमीन की उपलब्धता और मौके पर उसकी स्थिति की पैमाइश करके रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। शुक्रवार से इस टीम ने जब पैमाइश शुरू की तो पता चल रहा है कि चीनी मिल के जमीन के पुराने नंबरों में हेरफेर करके बहुत से लोगों ने नए नंबरों से अपने नाम करा लिया है। चीनी मिल के आस-पास तक लोगों ने इसकी जमीन पर कब्जा कर पक्के निर्माण करा लिए हैं। ऐसे में यदि निष्पक्ष रूप से पैमाइश और जांच-पड़ताल हो जाए तो बहुत से लोगों के मकान इसकी जद में आएंगे। शनिवार को दूसरे दिन भी राजस्व विभाग की टीम ने पहुंचकर पैमाइश की। पडरौना चीनी मिल के बारे में कुछ महत्वपूर्ण बातें- -वर्ष 1920 में रायबहादुर कुंवर प्रताप नारायण सिंह ने कराई थी चीनी मिल की स्थापना। -वर्ष 1960 में कपड़ा मंत्रालय के अधीन ब्रिटिश इंडिया कारपोरेशन लिमिटेड (बीआईसी) में विलय हो गया। -कैशलेस होने के कारण 31 मार्च, 1991 को सिक इंडस्ट्रियल कंपनीज (स्पेशल प्राविजन) एक्ट के अंतर्गत वीआईएफआर, नई दिल्ली को पुनरुत्थान के लिए सुपुर्द किया गया। -वीआईएफआर की तरफ से पडरौना चीनी मिल को चलाने के लिए 18 जून, 2003 को जेएसएल (वर्तमान में जेएचवीडीएसएमएल) की स्कीम को पारित किया गया। -वीआईएफआर नई दिल्ली के आदेश के क्रम में जेएसएल की तरफ से 2 अगस्त, 2005 को पडरौना चीनी मिल का अधिग्रहण किया गया। जेएसएल ने गन्ना पेराई सत्र 2005-06 से वर्ष 10 जुलाई, 2008 तक चीनी मिल को संचालित किया। -इसके बाद वीआईएफआर, नई दिल्ली ने स्वीकृत शर्तों को मेसर्स जेएसएल द्वारा पूरा न करने पर स्कीम को निरस्त कर दिया और पुन: पुराने प्रबंध तंत्र कपड़ा मंत्रालय भारत सरकार के अधीन वीआईसी लिमिटेड को हस्तांतरित कर दिया गया। -वीआईएफआर ने स्कीम निरस्त होने की दशा में जेएसएल ने उच्च न्यायालय इलाहाबाद में याचिका दायर की। याचिका दायर होने के बाद मार्च 2012 तक जेएसएल चीनी मिल का संचालन करती रही। इनके पक्ष को सुनने के बाद उच्च न्यायालय ने मेसर्स जेएसएल की याचिका को 12 दिसंबर, 2013 को निरस्त कर दिया। उसके बाद से वर्तमान में कपड़ा मंत्रालय भारत सरकार के अधीनस्थ होते हुए वर्ष 2013 से बंद है।

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