खोखली हो चुकी है कप्तानगंज डिस्टलरी, अब सिर्फ ढांचा और यादें बाकी
कुशीनगर के कप्तानगंज डिस्टलरी में पिछले 18 वर्षों से कोई गतिविधि नहीं हुई है। 2008 में बंद होने के बाद, इसकी हालत खस्ता हो गई है। मालिक वाईके झुनझुनवाला और उनके पुत्र जेल में हैं, जबकि डिस्टलरी के ऑफिसर बकाया वेतन के लिए संघर्ष कर रहे हैं। धोखाधड़ी के आरोपों के चलते कानूनी विवाद जारी है।

कुशीनगर। वित्तीय धोखाधड़ी के मामले में मालिक वाईके झुनझुनवाला और उनके पुत्र के जेल जाने के बाद सुर्खियों में आई कप्तानगंज डिस्टलरी पिछले 18 वर्षों से बंद पड़ी है। वर्ष 2008 में इसकी चिमनी से आखिरी बार धुआं निकला था, लेकिन अब यह कभी एशियाई स्तर पर पहचान रखने वाली डिस्टलरी खंडहर में तब्दील हो चुकी है। बाहर से इसका ढांचा और चिमनी भले दिखाई देती हो, लेकिन अंदर से यह पूरी तरह खोखली हो चुकी है। करीब 49 एकड़ भूमि में फैली इस डिस्टलरी की स्थापना साल 1944-45 में कोलकाता के प्रसिद्ध व्यवसायी सेठ इंदरचंद ने कराई थी। वर्ष 1962 में इसे सेठ इंदरचंद ने सोमैया ग्रुप को बेच दिया। सोमैया ग्रुप के दौर में डिस्टलरी की पहचान सोने का अंडा देने वाले कारखाने के रूप में होती थी। बाद में सोमैया ग्रुप ने परिस्थितियां बिगड़ने पर साल 2001 में इसे वाईके झुनझुनवाला को बेच दिया गया। झुनझुनवाला ग्रुप ने इसे महज सात वर्षों तक संचालित किया और वर्ष 2008 में कप्तानगंज चीनी मिल को 28.5 करोड़ रुपये में मौखिक सहमति के आधार पर सौंप दिया। डिस्टलरी की मौजूदा स्थिति खाली डब्बा और भीतर से माल गायब के समान हो चुकी है।
डिस्टलरी की खस्ता हालत
बाहर से यह जंगल झाड़ियों में ढंके ढांचा के रूप में दिखता है, पर अपने सुनहरे अतीत की याद अवश्य दिलाता है। यह अंदर से पूरी तरह खोखली इसलिए हो चुकी है, क्योंकि इसके कलपुर्जे स्क्रैप के रूप में बरसों पूर्व सरकारी नियम कानून को ठेंगा दिखाने के लिए बेचा जा चुका है। स्क्रैप बेचने के पीछे प्लानिंग यह था कि कारखाने के रूप में इसके रजिस्ट्री के लिए करीब छह से सात करोड़ रुपये का सरकारी स्टांप लगता, लेकिन खाली जमीन के नाम पर रजिस्ट्री करने पर स्टांप फीस कम हो जाता है। इसके नाते स्क्रैप के साथ-साथ इसके अंदर के बिल्डिंग भी जमींदोज कर मलबे को औने-पौने दाम पर बेच दिया गया। फिलहाल मौके पर अभी केवल आगे का ढांचा और इसकी चिमनी दिखती है।
मजदूरों की स्थिति
कप्तानगंज क्षेत्र में विशेष पहचान रखने वाले कारखाना से सटे इसके वृंदावन कॉलोनी पर इसलिए हाथ नहीं लगाया जा सका, क्योंकी जंगल पेड़-पौधों और उसमें रहने वाले विषैले जीव जंतु के बीच डिस्टलरी के ऑफिसर और कामगार अभी भी निवास करते हैं। उनका कहना है कि हमारा पूर्ण भुगतान जब तक नहीं मिलेगा, यहां से नहीं हटेंगे। डिस्टलरी में कार्यरत आठ से नौ ऑफिसर का बकाया वेतन से संबंधित मुकदमा लेबर कोर्ट द्वारा खारिज किया जा चुका है, जिसके क्रम में यह अब सिविल कोर्ट जाने की तैयारी कर रहे हैं। जबकि मजदूरों का अधिकांश भुगतान कनोडिया ग्रुप द्वारा डिस्टलरी को अपने मौखिक अधिग्रहण में लेने के बाद लेबर कोर्ट में चल रहे मुकदमे से निजात पाने के लिए किया जा चुका है। हालांकि, डिस्टलरी मजदूर संगठन का कहना है कि अभी भी रकम शेष है।
धोखाधड़ी का मामला
जहां तक धोखाधड़ी का मामला है तो डिस्टलरी के मालिक द्वारा कप्तानगंज चीनी मिल स्वामित्व कनोडिया ग्रुप को 28.5 करोड़ में बेचे जाने का सौदा और तीन वर्ष का एग्रीमेंट तय हुआ था। तब बैनामा में अधिक रकम सरकारी रसूम के रूप में लगने से बचने के लिए पहले तो इसके कलपुर्जे स्क्रैप के रूप में कनोडिया ग्रुप द्वारा चुपके-चुपके प्राइवेट कारोबारी के हाथों बेच दिया गया। बाद में डिस्टलरी मालिक पर जमीन रजिस्ट्री का दबाव बनाया जाने लगा। सूत्रों का कहना है कि डिस्टलरी मलिक झुनझुनवाला का रुख बदल चुका था। वह कनोडिया ग्रुप के सामने शर्त रखने लगे कि स्क्रैप का आठ से नौ करोड़ रुपये काटकर शेष रकम वापस ले लें, हमें अब डिस्टलरी नहीं बेचना है।
इसके बाद कनोडिया ग्रुप द्वारा कोर्ट की शरण ली गई, जिसके क्रम में कोर्ट के आदेश पर डिस्टलरी मलिक को पुत्र के साथ जेल जाना पड़ा। डिस्टलरी मालिक द्वारा चीनी मिल के साथ एग्रीमेंट किए गए कारखाना और भूल-भुलैया की जमीन के अलावा शेष बचे अन्य करीब 8 एकड़ भूमि में से अब तक 1.76 एकड़ भूमि हाल के वर्षों में कप्तानगंज के प्रॉपर्टी डीलर्स को बेचा जा चुका है, शेष भूमि अभी बिकना बाकी है।
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