दोआबा के लाल का हिंदी को सहज, सरल बनाने का विशेष प्रयास
Kausambi News - गंगा के किनारे बसे कंथुआ गांव के रणविजय निषाद ने हिंदी साहित्य में जटिलताओं को कम करने के लिए कई महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखी हैं। उन्होंने 2018 और 2019 में 'पर्यावरण संचेतना' और 'जल संचेतना' जैसी...
जिले के गंगा के किनारे बसे कंथुआ गांव के रहने वाले रणविजय निषाद ने हिंदी साहित्य की जटिलताओं को कम करने की कोशिश करते हुए स्वलिखित पुस्तकों में उसे सहज करने का पूरा प्रयास किया गया और जगत में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। मूल रूप से कृषि कीट विज्ञान के विशेषज्ञ रणविजय ने शुद्ध हिंदी भाषा के माध्यम से अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकों की रचना की है। इनमें पर्यावरण, जल संरक्षण और सामाजिक सरोकारों से जुड़े विषय प्रमुखता से उभरकर सामने आते हैं। रणविजय ने 2018 में ‘पर्यावरण संचेतना तथा 2019 में ‘जल संचेतना जैसी पुस्तकों के जरिए समाज को जागरूक करने का कार्य किया।

वर्ष 2023 में उनकी तीन महत्वपूर्ण कृतियां प्रकाशित हुईं। इसमें ‘समग्र जल प्रबंधन, ‘हिंदी-व्याकरण कौमुदी और ‘समग्र पर्यावरण दर्शन शामिल हैं। इसके अतिरिक्त उनकी अन्य उल्लेखनीय साझा कृतियों में ‘स्मृतियों की धूप-छांव, ‘पर्यावरण-मित्र, ‘प्रकृति के आंगन में, ‘सेवा संवाद और ‘आनन्द कौमुदी शामिल हैं। इन पुस्तकों के माध्यम से वह न केवल पर्यावरण संरक्षण और जल प्रबंधन पर प्रकाश डालते हैं, बल्कि सामाजिक व सांस्कृतिक मुद्दों को भी सहज शैली में प्रस्तुत करते हैं। रणविजय अपने साहित्य के जरिए पाठकों को पर्यावरण और समाज के प्रति सजग होने का संदेश देते हैं। हिंदी व्याकरण जैसे जटिल विषय को भी उन्होंने सहज भाषा में प्रस्तुत कर विद्यार्थियों और पाठकों के लिए उपयोगी बनाया है। उनके कार्यों के लिए उन्हें उपमुख्यमंत्री समेत शिक्षा क्षेत्र के कई अधिकारियों से सम्मान भी मिला है। इसके अलावा उनकी विभिन्न पुस्तकों से समाज व जिले के लोगों को सहजता से संदेश प्राप्त हो रहे हैं।

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