जंजीरी मातम और नौहाख्वानी से गूंजा दारानगर
नगर पंचायत दारानगर में मोहर्रम के अवसर पर कदीमी जुलूस बड़े अदब से निकाला गया। अंजुमन असदिया के सदर ने कर्बला की घटनाओं का जिक्र करते हुए इसकी महानता के बारे में बताया। यह जुलूस गंगा-जमुनी तहजीब का प्रतीक है, जिसमें विभिन्न समुदाय मिलकर भाग लेते हैं।
नगर पंचायत दारानगर कड़ा धाम क्षेत्र के वार्ड नौ स्थित सैयदवाड़ा में मोहर्रम की आठवीं का कदीमी जुलूस पूरे अकीदत और एहतराम के साथ निकाला गया। ‘चलो सर नंगे इब्ने शाह-ए-मर्दां की सवारी है’ की सदाओं के बीच मरहूम नवाब हुसैन की इमामबारगाह से अलम और जुल्जनाह की शबीह बरामद हुई, जिसके साथ बड़ी संख्या में अजादार शामिल हुए। जुलूस की शुरुआत अंजुमन असदिया के साहब-ए-बयाज बाकर अली की नौहाख्वानी से हुई। उन्होंने दर्द भरे नोहों से कर्बला के शहीदों को याद किया। जुलूस जब दारानगर चौराहे पर पहुंचा तो मोहम्मद अब्बास, अली अब्बास, राजू, तकी हैदर काजिम, अरमान और इमरान हैदर ने नौहे पढ़े। नौहाख्वानी के दौरान अजादारों ने सीनाजनी और जंजीरी मातम कर इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों की शहादत को याद किया। इस अवसर पर अंजुमन असदिया के सदर असद सगीर ने कहा कि कर्बला केवल एक युद्ध नहीं बल्कि सत्य, न्याय और इंसानियत की रक्षा के लिए दी गई महान कुर्बानी का नाम है। उन्होंने कहा कि इमाम हुसैन ने यजीद की बैअत स्वीकार करने के बजाय अपने परिवार और साथियों सहित शहादत को चुना, जिससे मानवता को अत्याचार के खिलाफ डटकर खड़े होने का संदेश मिला। आज की अजादारी उसी कुर्बानी और संदेश को याद करने का माध्यम है। कर्बला की घटना ने पूरी दुनिया को यह सिखाया कि जुल्म के सामने सिर झुकाना नहीं बल्कि हक और सच के लिए संघर्ष करना चाहिए। यही कारण है कि सदियों बाद भी इमाम हुसैन का नाम इंसाफ और कुर्बानी की मिसाल बना हुआ है। जुलूस अपने पारंपरिक मार्गों से होता हुआ कटरा पहुंचा और अंत में कर्बला में जाकर संपन्न हुआ। पूरे मार्ग में या हुसैन की सदाएं, नौहाख्वानी और मातम का सिलसिला जारी रहा। सुरक्षा और व्यवस्था बनाए रखने में पुलिस और स्थानीय लोगों ने भी सहयोग किया。
गंगा-जमुनी तहजीब की अनूठी मिसाल
दारानगर का यह कदीमी जुलूस हर वर्ष हिंदू-मुस्लिम एकता और आपसी सौहार्द का संदेश देता है। जुलूस में विभिन्न समुदायों के लोग शामिल होकर सेवा और सहयोग करते हैं, जिससे क्षेत्र की गंगा-जमुनी तहजीब की खूबसूरत तस्वीर देखने को मिलती है। स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि यह जुलूस सैकड़ों वर्षों पुरानी परंपरा का हिस्सा है।


