प्राकृतिक तरीका है इको-फ्रेंडली होलिका दहन
Kausambi News - इस बार होलिका दहन को पर्यावरण संरक्षण के संदेश के साथ मनाने की तैयारी है। शिक्षक रणविजय निषाद ने अपील की है कि होलिका में केवल प्राकृतिक सामग्री का ही प्रयोग करें। इको-फ्रेंडली दहन से वायु प्रदूषण में कमी आएगी और पर्यावरण को सुरक्षित रखा जा सकेगा। सभी से अनुरोध है कि त्योहार श्रद्धा के साथ मनाएं।

आस्था और भक्ति का प्रतीक होलिका दहन इस बार जनपद में पर्यावरण संरक्षण के संदेश के साथ मनाने की तैयारी है। भगवान नरसिंह और भक्त प्रह्लाद की भक्ति से जुड़ा यह विशेष पर्व भारतीय संस्कृति की अमिट पहचान है। परंपरागत रूप से होलिका में सूखे पत्ते, उपले, चंदन, कपूर, घी और हवन सामग्री डाली जाती थी, जिससे वातावरण शुद्ध होता था। लेकिन समय के साथ इसमें बहुत बदलाव आया और गीली लकड़ी, प्लास्टिक, केमिकल युक्त रंग व अन्य हानिकारक पदार्थ होलिका में जलाए जाने लगे। जिसका पर्यावरण पर काफी प्रभाव पड़ रहा है । विशेषज्ञों के अनुसार इससे निकलने वाला धुआं वायु प्रदूषण बढ़ाता है, जिससे सांस संबंधी रोग, एलर्जी और अन्य बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।
इसका दुष्प्रभाव पशु-पक्षियों, पेड़-पौधों और वन्य जीवों पर भी पड़ता है। ------------ इको-फ्रेंडली दहन के लिए की अपील शिक्षक एवं पर्यावरणविद् रणविजय निषाद ने जनपदवासियों से अपील करते हुए कहा कि इस बार सभी जनपदवासी होलिका दहन को पूरी तरह इको-फ्रेंडली तरीके से मनाएं। उन्होंने कहा कि होलिका में गोबर के कंडे (गोकाष्ठ), सूखे पत्ते, सूखे पुष्प, देशी घी, चंदन, कपूर और हवन सामग्री का ही प्रयोग करें, ताकि दहन के समय उठने वाला धुआं सुगंधित और साथ ही पर्यावरण के लिए हानिकारक न हो। उन्होंने जनता से आह्वान किया कि होलिका में प्लास्टिक और केमिकल युक्त सामग्री का प्रयोग न करें। श्रद्धालु रोली, चंदन, हल्दी, पुष्प, नारियल, गंगाजल और अन्न की आहुति देकर पर्व की पवित्रता बनाए रखें। ------------ हुड़दंग से रहें दूर, भक्तिभाव से हो आयोजन होलिका दहन के समय किसी प्रकार का हुड़दंग न हो। मां होलिका की विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर शांति और सौहार्द के वातावरण में दहन किया जाए। इससे त्योहार की गरिमा बनी रहेगी और सामाजिक समरसता भी मजबूत होगी। ------------ इको-फ्रेंडली होलिका दहन के फायदे इको-फ्रेंडली होलिका दहन से एक ओर जहां हरे पेड़ों की कटाई कम होगी और वायु प्रदूषण में कमी आएगी, वहीं गोबर के कंडों के उपयोग से गौ-पालकों को आर्थिक लाभ मिलेगा। प्राकृतिक सामग्री के दहन से वातावरण शुद्ध होगा और हानिकारक तत्वों का प्रभाव कम होगा। क्योंकि आज के समय में नासमझी और अनजाने में लोग होलिका में प्लास्टिक, टायर और केमिकल युक्त रंग आदि जलाते हैं जिससे निकली जहरीली गैसें मानव स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हैं। इससे पशु-पक्षियों और वन्य जीवों को भी नुकसान पहुंचता है तथा पर्यावरण का संतुलन बिगड़ता है। यदि सभी ने जनपद में इको-फ्रेंडली होलिका दहन की यह पहल शुरू की तो न केवल परंपरा को जीवंत रहेगी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वच्छ और सुरक्षित वातावरण की दिशा में एक सार्थक कदम साबित होगी। शिक्षक रणविजय निषाद ने आम जनमानस जागरूक करते हुए अपील की है कि होलिका दहन श्रद्धा के साथ करें, लेकिन प्रकृति और पर्यावरण की रक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दें।
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