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कांशीराम का वह वादा जिसने मायावती की बदली जिंदगी, अब अस्तित्व बचाने की चुनौती

कांशीराम का वह वादा जिसने मायावती की बदली जिंदगी, अब अस्तित्व बचाने की चुनौती

संक्षेप:

बहुजन समाज पार्टी आज अपनी अध्यक्ष मायावती का जन्मदिन मना रही है। कभी यूपी की सत्ता के शिखर पर पहुंचने वाली मायावती इस समय सबसे खराब दौर से गुजर रही हैं। उनके सामने शून्य से शुरू करने की चुनौती है।

Jan 15, 2026 11:05 am ISTYogesh Yadav लाइव हिन्दुस्तान, लखनऊ
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'मैं तुम्हें इतना बड़ा नेता बना दूंगा कि एक नहीं, बल्कि कलेक्टरों (IAS) की पूरी लाइन तुम्हारे आदेश के इंतज़ार में खड़ी रहेगी। बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक मान्यवर कांशीराम के इस एक वाक्य ने दिल्ली के एक साधारण परिवार की लड़की मायावती की ज़िंदगी बदल दी। आज वही मायावती अपना 70वां जन्मदिन मना रही हैं। राजनीति में कदम रखने के बाद देश के सबसे बड़े राज्य यूपी में अपने बल पर मायावती ने पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। आज का जन्मदिन उनके लिए केवल उत्सव नहीं, बल्कि बसपा के वजूद को बचाने के लिए 'करो या मरो' जैसा मोड़ है। ऐसे में 2027 के चुनाव के लिए पार्टी नेता मुहिम में जुटे हैं। मंडल मुख्यालयों पर बसपा का शक्ति प्रदर्शन हो रहा है।

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मायावती के जन्मदिन को बसपा 'जन कल्याणकारी दिवस' के रूप में मना रही है। आज के दिन मायावती पार्टी की आगे की रणनीति पर रोडमैप भी पेश कर सकती हैं। जन्मदिन पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उन्हें फोन कर बधाई दी और सोशल मीडिया पर लंबी आयु एवं अच्छे स्वास्थ्य की कामना की। समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव सहित कई नेताओं ने भी मायावती को शुभकामनाएं दी हैं।

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नरसिम्हा राव ने लोकतंत्र का चमत्कार बताया

कांशीराम ने 1984 में बसपा की स्थापना की और मायावती को पार्टी का हिस्सा बनाया। 2001 में एक रैली में कांशीराम ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। आज मायावती लाखों दलितों की 'बहनजी' हैं। मायावती को पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव ने लोकतंत्र का चमत्कार कहा था।

लगातार मेहनत कर खुद को खड़ा किया

मायावती के छोटे बाल (Short Hair) उनके व्यक्तित्व की पहचान हैं। इसके पीछे एक व्यावहारिक कहानी है। राजनीति के शुरुआती दौर में जब उन्हें दिन में 7-8 जनसभाएं करनी पड़ती थीं तो लंबे बालों को बार-बार संवारने में काफी वक्त ज़ाया होता था। मायावती ने अपने संघर्ष के समय को बचाने के लिए बाल कटवा लिए। इनकी कार्यशैली को भारतीय राजनीति में 'दलितों की मसीहा' और 'आयरन लेडी' के रूप में स्थापित किया।

गेस्ट हाउस कांड से यूपी की सत्ता के शिखर तक

मायावती की कहानी 2 जून 1995 के 'गेस्ट हाउस कांड' के बिना अधूरी है। लखनऊ के स्टेट गेस्ट हाउस में उन पर जानलेवा हमला हुआ, जहां उन्होंने खुद को एक कमरे में बंद कर अपनी जान बचाई थी। इसके बाद जब वे मुख्यमंत्री बनीं तो उनके कार्यकाल में कानून-व्यवस्था की जो धमक रही, उसकी मिसाल आज भी दी जाती है। 2007 में 'सोशल इंजीनियरिंग' (दलित-ब्राह्मण मेल) के दम पर उन्होंने पूर्ण बहुमत की सरकार बनाकर देश को चौंका दिया था।

अब शून्य से शुरू करने की चुनौती

2007 में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने वाली मायावती के पास इस समय यूपी विधानसभा में केवल एक विधायक है। 2024 के लोकसभा चुनाव में भी पार्टी का खाता नहीं खुला। राज्यसभा में भी एकमात्र सांसद रामजी गौतम हैं। उनका कार्यकाल इसी साल खत्म हो रहा है। इसके बाद 36 साल में पहली बार संसद के किसी भी सदन में बसपा का कोई प्रतिनिधित्व नहीं होगा। राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा भी खत्म होने का खतरा बसपा पर मंडरा रहा है।

क्या 'ब्लू बुक' बदलेगी किस्मत?

मायावती ने आज अपने जन्मदिन पर अपनी आत्मकथा के 21वें भाग 'ब्लू बुक' का विमोचन करेंगी। इसमें उन्होंने कार्यकर्ताओं के लिए नया 'सक्सेस मंत्र' दिया है। मंडल स्तर पर शक्ति प्रदर्शन के जरिए बसपा यह संदेश देना चाहती है कि वह 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव की रेस से बाहर नहीं हुई है।

जन्म और शिक्षा

15 जनवरी 1956 को दिल्ली में एक दलित (जाटव) परिवार में जन्मी मायावती नौ भाई-बहनों में एक हैं। पिता प्रभु दास डाकघर में कर्मचारी थे। गरीबी में पली-बढ़ीं, लेकिन पढ़ाई में अव्वल रहीं। दिल्ली विश्वविद्यालय से बीए, बीएड और एलएलबी की डिग्री हासिल की। 1977-1984 तक दिल्ली में शिक्षिका रहीं। 1984 में BSP में शामिल हुईं। 1989 में पहली बार सांसद बनीं। उत्तर प्रदेश की चार बार मुख्यमंत्री रहीं। भारत की पहली दलित महिला मुख्यमंत्री होने का भी गौरव हासिल हुआ। दलितों-बहुजनों के लिए आरक्षण और कल्याण योजनाओं को बढ़ावा दिया।

2007 में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाकर इतिहास रचा। पार्कों, स्मारकों (हाथी प्रतीक सहित) से बहुजन गौरव को प्रतीकात्मक रूप दिया। कुछ विवाद भी साथ रहे। जन्मदिन समारोहों की भव्यता, संपत्ति बढ़ोतरी और स्मारकों पर खर्च को लेकर विवाद होते रहे, लेकिन वे हमेशा दान और पार्टी फंडिंग से इसे जोड़ती रहीं।