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कानपुर या लखनऊ में ढाला गया था अंतिम मुगल शासक बहादुर शाह जफर का जारी सिक्का

कानपुर वरिष्ठ संवाददाता शायद यह बात बहुत कम लोगों को मालूम होगी कि अंतिम...

कानपुर या लखनऊ में ढाला गया था अंतिम मुगल शासक बहादुर शाह जफर का जारी सिक्का
हिन्दुस्तान टीम,कानपुरMon, 06 Dec 2021 12:50 PM
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शायद यह बात बहुत कम लोगों को मालूम होगी कि अंतिम मुगल शासक मोहम्मद शाह जफर यानी बहादुर शाह जफर के चलाए सिक्के का सम्बंध कानपुर और लखनऊ से भी था। जो सोने का सिक्का उनके समय में चलन में आया वह कानपुर या लखनऊ में ढाला गया था। यह खुलासा भारतीय अभिलेखागार के डायरेक्टर रह चुके डॉक्टर संजय गर्ग ने किया। वह रविवार को कानपुर लिट्रेचर सोसाइटी के जीएचएस-आईएमआर में आयोजित कानपुर कल्चरल फेस्टिवल में किया।

मिर्जा गालिब की थी इबारत

सिक्कों के माध्यम से भारतीय इतिहास को बहुत रोचक ढंग से पेश करते हुए उन्होंने बताया कि इस सिक्के पर जो भी लिखा था उस पर अंग्रेजों ने जब मिर्जा गालिब से पूछा तो उन्होंने अपने अंदाज में इससे इनकार कर दिया और कहा हो सकता है इसे शायद मोहम्मद इब्राहिम जौक ने लिखा हो। डॉ. गर्ग ने सिक्कों के माध्यम से कई ऐसे तथ्यों को भी उजागर किया जो आज चौकाते हैं।

सिक्कों में भगवान शिव, बुद्दा के कई रूप

उन्होंने सिकंदर के समय का सिक्का दिखाते हुए बताया कि इसमें एक ओर उसका चित्र और दूसरी ओर हाथी था। इन्हें प्रतीकों के रूप में प्रस्तुत किया। कुषाण युग की गोल्ड क्वॉइन दिखाई जिसमें एक और भगवान शिव का चित्र था। तब ही कई तरह के सिक्के प्रचलन में आए जिसमें बुद्धा के कई रूप दिखाए गए थे। तब कॉपर के भी सिक्के चलाए गए थे। चंद्र गुप्त मौर्य के समय में रानी कुमार देवी के चित्र वाला सिक्का प्रचलन में आया था। यह भी स्वर्ण मुद्रा थी। समुद्र गुप्त के युग के एक सिक्के में अश्वमेध यज्ञ दिखाया गया है।

साम के सिक्के में देवी की मूर्ति

मोहम्मद गजनी के युग में जारी हुए सिक्के में दो भाषाओं का उपयोग किया गया था। मोहम्मद बिन साम (मोहम्मद गौरी) के समय जो सिक्का प्रचलन में आया उसमें एक ओर उसका नाम मोहम्मद बिन साम और दूसरी ओर देवी की मूर्ति थी। मोहम्मद बिन तुगलक ने पहली बार टोकन करेंसी जारी की। हुमायूं के समय कलमा (मुस्लिमों का धार्मिक पाठ) वाले सिक्कों की विस्तृत व्याख्या की। उसमें एक बार सुन्नी कलमा और दूसरी बार कंधार जाने पर शिया कलमा लिखा गया था। सिक्के में एक ओर अरबी, फारसी तो दूसरी ओर कलमा का संस्कृत में अनुवाद था। अकबर के समय दीने इलाही का प्रभाव सिक्कों पर दिखा। जहांगीर के समय 11 किलो (1000 तोला, मोहर आगरा) का सिक्का जारी किया गया। नूर जहां के चित्र के साथ जारी सिक्का पहला सिक्का था जिसमें बादशाह बेगम का कंसेप्ट सामने आया।

शास्त्रीयता में दिखा सूफियाना अंदाज

महान गायक कुमार गंधर्व जी की बेटी कलापिनी कोमकली ने अपने अदभुत गायन से दर्शकों को मोह लिया। उनकी गायकी में शास्त्रीयता के साथ-साथ सूफ़ी का भी मिश्रण था। उन्होंने राग पूरनाधन्याश्री, राग हमीर के बाद कबीर, सूरदास, मीरा और गोरखनाथ के पदों को भी गाकर सुनाया। श्रोताओं ने देर रात तक मंत्रमुग्ध होकर उनकी गायकी का आनंद लिया। कलापिनी कोमकली ने इससे पूर्व बताया कि यह सच है कि हमारी पहले संगीत में रुचि नहीं थी।ऐसे में संगीत से मेरी दोस्ती होने में वक्त लग गया। हमारा आधुनिक संगीत से कोई सरोकार नहीं है। शास्त्री संगीत हमारे जीवन की धारा है। जिस तरह से दूसरे संगीत को कारपोरेट का साथ मिलता है, अगर वैसा ही शास्त्री संगीत और कलाओं को भी साथ मिलना चाहिए।

दि गैंग सिस्टर्स का रहा अंदाज निराला

गैंगसिस्टर्स का अंदाज निराला रहा। इसमें जानी मानीं पांच कवित्रियों दीप्ति मिश्रा, कविता गुप्ता, लता हया, प्रज्ञा विकास, अर्चना जौहरी ने एक नए अंदाज में अपनी रचनाएं पेश कीं। गैंगसिस्टर्स का नेतृत्व कर रहीं दीप्ति मिश्रा ने ''सच को मैं ने सच कहा, जब कह दिया तो कह दिया, अब जमाने की नजर में यह हिमाकत है तो है'' सुनाकर धड़कनों को बढ़ा दिया। लता हया ने पढ़ा, ''मैं जब चाहूंगी पिंजड़ा ले उडूंगी, परों को आजमाना आ गया है'' सुनाई। कानपुर में जन्मीं प्रज्ञा शर्मा ने कोरोना काल पर चोट करते हुए पढ़ा, ''अब अपने जिस्म के मलवे से सिर उठाओ तुम, जो हो चुके हैं अब उन हादसात से निकलो सुनाई।'' कानपुर में ही जन्म लेने वालीं अर्चना जौहरी ने भी काव्य पाठ किया।

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