पौराणिक देवयानी सरोवर को मातृगया की है मान्यता
Kanpur News - कानपुर देहात के मूसानगर कस्बे के देवयानी सरोवर को मातृ गया का दर्जा प्राप्त है। यहां पितृपक्ष के दौरान पितरों को पिंडदान करने के लिए बड़ी संख्या में लोग आते हैं। यह पितृपक्ष 7 सितंबर से 21 सितंबर तक...
कानपुर देहात,संवाददाता। मूसानगर कस्बे के पौराणिक देवयानी सरोवर को मातृ गया का दर्जा प्राप्त है। इस सरोवर से दो किमी दक्षिण में स्थित यमुना नदी के उत्तर गामिनी होने से यहां प्रथम पिंडदान का विशेष महत्व है। मान्यता है कि यहां पितरों का श्राद्ध किए बगैर गया में श्राद्ध का फल पूरा नहीं होता है। पितृपक्ष में बड़ी संख्या में लोग पितरों को पिंडदान करने यहां आते हैं। पितृपक्ष शुरू होने में मात्र पांच दिन शेष हैं। इसके चलते यहां तैयारियां शुरू हो गई हैं। आश्विन कृष्ण पक्ष का 15 दिन का समय पितृपक्ष कहा जाता है। इस अवधि में पितरों को संतुष्ट करने के लिए लोग पिंडदान, तर्पण, श्रद्धा के साथ करते हैं।
इसको श्राद्ध कर्म कहा जाता है। आगामी 7 सितंबर से शुरू हो रहा पितृपक्ष 21सितंबर तक रहेगा। इस पक्ष में दिनों में लोग श्राद्ध कर्म करते हैं। पितृपक्ष नजदीक देख मूसानगर के देवयानी सरोवर में पितरों को पिंड दान करने आने वालों के लिए व्यवस्थाएं चाक चौबंद करने की कवायद शुरू हो गई है। पितृपक्ष में गया जाने के पहले लोग यहां करते हैं पिंडदान माता-पिता की पुत्र को लेकर एक ही इच्छा होती है कि देहावसान के बाद वह उनका अंतिम संस्कार करे और पितृ पक्ष में पिंडदान करे। वैसे देश के करीब 55 स्थानों पर पिंडदान का महत्व है लेकिन उत्तर भारत में उत्तराखंड के बद्रीनाथ धाम और बिहार के गया में इस कर्म का विशेष महत्व माना जाता है, लेकिन मूसानगर कस्बे के पौराणिक देवयानी सरोवर में भी पिंड दान करने से बद्रीनाथ और गया जी जैसा फल मिलने की मान्यता है। पितृ पक्ष में प्रथम पिंडदान के लिए यहां आसपास के जिलों के अलावा दूसरे प्रांतों से भी बड़ी संख्या में लोग आते हैं। राजा ययाति ने देवयानी के नाम से बनवाया था सरोवर देवयानी सरोवर को लोग छोटी गया के नाम से भी जानते हैं। यहां पितृ पक्ष में लोग श्राद्ध, तर्पण व पिंड दान करते हैं। इतिहासकारों के अनुसार एक समय दैत्यराज वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा व दैत्य गुरु शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी यहां जंगल में घूमने आई थीं। जंगल में सरोवर देखकर दोनों स्नान करने लगीं थीं। इस बीच भगवान शंकर को आते देख देवयानी ने जल्दबाजी में शर्मिष्ठा के वस्त्र पहन लिए थे। इससे गुस्से में आकर शर्मिष्ठा ने देवयानी को कुएं में धक्का दे दिया था। जाजमऊ के राजा ययाति ने देवयानी को बाहर निकाला था। इसकी जानकारी पर शुक्राचार्य ने राजा ययाति से देवयानी का विवाह कर दिया था। दैत्यराज वृषपर्वा से नाराजगी जताकर उनका राज्य छोड़कर जाने को कहा था, लेकिन राजा ययाति के विनय करने पर शर्मिष्ठा को देवयानी की दासी बनाने की शर्त पर माने थे। इसके बाद राजा ययाति ने सरोवर को भव्य रूप प्रदान किया था, जिसे देवयानी सरोवर कहा गया।
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