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उन्नाव रेप कांडः पुलिस या डॉक्टर में कौन सच्चा और कौन झूठा

रेप के अारोप में गिरफ्तार भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर।

माखी पुलिस, जेल प्रशासन और डॉक्टरों की लापरवाही की वजह से बंदी रेप पीड़िता के पिता की मौत से भूचाल आ गया। पूरे देश में मामला सुर्खियों में आया और शासन से शिकंजा कसा तो अब सभी राज खोलने लगे हैं। जेल बंदी की मौत के पीछे बड़़ी लापरवाही उजागर हुई है। पुलिस ने अस्पताल लाए गए पीड़िता के पिता को जेल भेजने में बड़ी फुर्ती दिखाई गई। शरीर पर 18 चोट होने के बाद भी उसे 21 घंटे के अंदर जेल में ठूंस दिया गया। अब जेल और अस्पताल प्रशासन एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं।

अस्पताल के डॉक्टरों का दावा है कि पुलिस की तरफ से दबाव बनाया गया इस वजह से बंदी का सही उपचार नहीं हो सका। जेल में बंदी के स्वास्थ्य पर ध्यान नहीं दिया गया। जेल प्रशासन को जेल डॉक्टर ने दो बार चिट्ठी लिखी फिर भी मरीज को समय से अस्पताल नहीं ले जाया गया। वहीं जेल प्रशासन सफाई दे रहा है कि जिला अस्पताल ने डॉक्टर भेजने में देर की। 5 अप्रैल को जेल से चिट्ठी लिखी गई थी कि उपचार के लिए डॉक्टर भेजा जाए। अस्पताल ने एक दिन बाद 6 अप्रैल को डॉक्टर भेजे खून और पेशाब की जांच कराई जाए। जेल प्रशासन 7 अप्रैल को बंदी को लेकर जिला अस्पताल पहुंचा। बंदी के साथ ही यह भी लिखकर भेजा कि बंदी को भर्ती कर इलाज करें मगर जिला अस्पताल ने जांच के बाद दवा देकर उसे शाम को जेल वापस कर दिया। 8 अप्रैल की सुबह जेल में बंदी की तबीयत फिर खराब हो गई लेकिन जेल प्रशासन ने उसे रात 9:05 पर जिला अस्पताल में भर्ती कराया, छह घंटे 50 मिनट बाद बंदी ने दम तोड़ दिया। 
 

खाकी ने रिपोर्ट तैयार करने को बनाया था दबाव
3 अप्रैल की शाम रेप पीडि़ता के पिता को माखी पुलिस घायलावस्था में जिला अस्पताल में भर्ती कराया था। पिता पेट दर्द की बात कहता रहा। डॉक्टरों की मानें तो पुलिस को न जाने क्या जल्दी थी कि वह उन पर रिपोर्ट तैयार करने का दबाव बना रहे थे। डॉक्टरों की माने तो पुलिस ने 4 अप्रैल को अस्पताल से रिलीज करा लिया और उसी दिन शाम को करीब सात बजे जेल भेज दिया। जेल में हालत बिगड़ने पर 6 अप्रैल को डॉ. आलोक पाण्डेय की सलाह पर अल्ट्रासाउंड व ब्लड जांच करवाई गई। जांच रिपोर्ट में नॉर्मल आने पर जेल वापस भेज दिया। 
 

जेल के डॉक्टर जिला अस्पताल भेजने को लिखा था
8 अप्रैल को जेल के डॉक्टर वंश बहादुर सिंह ने जेल प्रशासन को दो बार लिखित देकर जिला अस्पताल भेजने को कहा था। जेल प्रशासन की लापरवाही के चलते 8 अप्रैल की देर शाम बंदी को जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया। पीडि़त अस्पताल में छह घंटे 50 मिनट ही जीवित रह पाया। डॉक्टरों का दावा है कि डॉक्टर जब तक बीमार मरीज की 24 घंटे जांच पड़ताल नहीं कर लेते तब तक बीमारी का पता नहीं चल पाता है। रात को जांच केंद्र बंद था। इसलिए तमाम जांचें नहीं हो पाईं। 
 

पुलिस के दबाव में डॉक्टर ने किया काम
जिला पुरुष अस्पताल के निलंबित सीएमएस डॉ. डीके द्विवेदी का कहना है कि 1 से 4 अप्रैल तक वह छुट्टी पर थे। डॉ. एसएन गुप्त से बंदी का इलाज किया था। कोर्ट में पेश करने का दबाव बनाते हुए डॉक्टर के पास कई फोन भी आए। इसके अलावा डॉक्टर से बंदी के नॉर्मल होने का अभिलेख तैयार करवा कर जेल भेजा गया था। 24 घंटे तक मरीज की जांच के बाद ही डॉक्टर बीमारी का पता कर इलाज मुहैया करवाते हैं। रात को मरीज लाया जाता है तो जांच की सुविधा नहीं है। डॉक्टरों ने सही उपचार की कोशिश की। उन्होंने दावा किया कि अस्पताल से चूक नहीं हुई।
 

अस्पताल ने नहीं किया भर्ती : प्रभारी जेलर
प्रभारी जेल आलोक शुक्ला ने सीधे तौर पर कहा कि जिला अस्पताल में सही से उपचार नहीं किया गया। 4 अप्रैल की शाम 6.30 बजे बंदी को अस्पताल से डिस्चार्ज कराया गया। पांच तारीख को बंदी की तबीयत खराब हो गई तो सीएमएस को चिट्ठी लिखी गई। मांग की गई कि बंदी की तबीयत खराब है। 5 अप्रैल की शाम तक अस्पताल से कोई डाक्टर नहीं आया। छह अप्रैल को डॉक्टर आया तो आल्ट्रासाउण्ड और अन्य जांच की सलाह दी। अस्पताल की लिखी दवाएं ही चल रही थीं। 7 अप्रैल को जेल से  लिखकर भेजा गया था कि बंदी की तबीयत खराब है कृपया उसे जिला अस्पताल में भर्ती करके उपचार करें। उसके बाद भी जिला अस्पताल में बंदी को भर्ती नहीं किया गया। आठ को फिर तबीयत खराब हुई तो उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया। जहां नौ अप्रैल की भोर में बंदी ने अस्पताल में उपचार के दौरान दम तोड़ दिया।

अनसुलझे सवाल जो बयां कर रहे लापारवाही 
जिला अस्पताल के डॉक्टरों पर किसी का दबाव था तो उन्होंने अपने उच्चाधिकारियों, डीएम और एसपी को अवगत क्यों नहीं कराया? 
डाक्टरों पर आखिर किस तरह का दवाब था। दबाव देने वाले ने क्या कोई धमकी दी थी। क्या उन्हें कोई खतरा था?
अस्पताल के डॉक्टर किसी की जिंदगी बचाने के लिए हैं कि किसी के दबाव में आकर फर्जी रिपोर्ट तैयार करने के लिए?
किस पुलिसकर्मी की ओर से दबाव बनाया गया और किसने फोन किया इस बात को अस्पताल के डॉक्टरों ने उजागर क्यों नहीं किया? 
जेल प्रशासन को अस्पताल के डॉक्टर ने दो बार बंदी को जिला अस्पताल भेजने की चिट्टी लिखी तो उसे समय पर क्यों नहीं अस्पताल ले जाया गया?
बंदी की मौत में सबसे बड़ी चूक अस्पताल और जेल की तरफ से हुई है। अगर सही से उपचार हो जाता तो शायद उसकी जान बच जाती? 
घटना में जेल प्रशासन की भूमिका संदेह के घेरे में आ रही है। आखिर जेल प्रशासन किसी के साथ इतनी बड़ी लापरवाही कैसे कर सकता है? 

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  • Web Title:MLA told BJP National President about problem of mill area