IIT Kanpur will monitor pollution of the capital Delhi - राजधानी दिल्ली के प्रदूषण पर नजर रखेगा आईआईटी कानपुर DA Image

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राजधानी दिल्ली के प्रदूषण पर नजर रखेगा आईआईटी कानपुर

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देश की राजधानी दिल्ली के प्रदूषण पर अब आईआईटी कानपुर नजर रखेगा। संस्थान के वैज्ञानिक एक ऐसा नेटवर्क तैयार कर रहे हैं, जो दिल्ली में सेंसर के जरिए पल-पल की रिपोर्ट उपलब्ध कराएगा। यह नेटवर्क इंटरनेट ऑफ थिंग्स (आईओटी) तकनीक पर काम करेगा। इस रिपोर्ट के आधार पर दिल्ली या केंद्र सरकार योजना बनाकर उचित कदम उठा सकेगी। इसके लिए आईआईटी कानपुर और स्वीडन की एक कंपनी के बीच करीब एक महीने पहले करार भी हुआ है। जो मिलकर अगले छह माह में यह नेटवर्क तैयार करेंगे। 14 अक्तूबर को दिल्ली में होने वाली इंडियन मोबाइल कांग्रेस में इस पर चर्चा भी होनी है। 


दिल्ली में प्रदूषण सबसे बड़ा मुद्दा है। सर्दी और गर्मी के मौसम में कई बार प्रदूषण का स्तर इस कदर बढ़ जाता है कि उसके कारण वहां रहने वाले लोगों को सांस लेने में भी दिक्कत होती है। केंद्र और दिल्ली सरकार प्रदूषण को कम करने के लिए निरंतर प्रयास कर रही है। कोई भी योजना तभी सफल होती है, जब उसकी समस्या की पूरी जानकारी और डाटा उपलब्ध हो। इसलिए आईआईटी कानपुर के वैज्ञानिक स्वीडन की दूरसंचार उपकरण बनाने वाली एक कंपनी के साथ मिलकर एक नेटवर्क तैयार करने जा रहा है। 


आईआईटी के वैज्ञानिक इंटरनेट ऑफ थिंग्स आधारित नैरो बैंड सेंसर बनाएगा। जिसे दिल्ली के अलग-अलग स्थानों पर लगाया जाएगा। ये सेंसर स्वचालित होंगे। जो ऑटोमेटिक तरीके से एक निश्चित अंतराल पर निर्धारित समय के अनुसार सूचना देते रहेंगे। ये सेंसर प्रदूषण के स्तर का आंकड़ा, स्त्रोत और स्थान के बारे में भी प्रभावी तरीके से जानकारी देंगे। इन सभी डाटा के आधार पर एक रिपोर्ट तैयार की जाएगी। जिसे सरकार को भेजने के साथ सार्वजनिक भी किया जाएगा। इस सेंसर से पीएम2.5, पीएम10 के साथ पीएम1 का भी डाटा मिलेगा। अभी तक अधिकांश सेंसर ये डिवाइस सिर्फ पीएम10 और पीएम2.5 का ही डाटा उपलब्ध कराती है। 


पीएम10 - हवा में मिले 10 माइक्रोमीटर से छोटे कण होते हैं। इन कणों में अधिकांश सड़क की धूल और इंडस्ट्री से निकलने वाले धुएं के कण होते हैं। ये फेफड़ों में पहुंच कर बहुत नुकसान पहुंचाते हैं। 
पीएम2.5 - हवा में मिले 2.5 माइक्रोमीटर से छोटे कण होते हैं। इन कणों में अधिकांश एरोसोल और दहन कण होते हैं। यह कोशिका में पहुंच कर नुकसान पहुंचाते हैं। 
पीएम1 - हवा में मिले 0.1 माइक्रोमीटर से भी छोटे अल्ट्राफाइन कण होते हैं। यह अल्ट्राफाइन डस्ट अत्यधिक महीन होते हैं और अधिक नुकसान करते हैं। ये कण सीधे फेफड़ों से होकर रक्तप्रवाह में मिल जाते हैं और शरीर के सभी अंगों में फैल जाते हैं। 


 

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