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कन्नौज

एक महीने की बेगारी: काम सालभर का, मानदेय 11 महीने का

हिन्दुस्तान टीम,कन्नौजPublished By: Newswrap
Thu, 17 Jun 2021 06:20 AM
कन्नौज। संवाददाता
 शिक्षामित्रों को मानदेय तो 11 महीने का मिलता है, लेकिन काम 12...
1 / 3कन्नौज। संवाददाता शिक्षामित्रों को मानदेय तो 11 महीने का मिलता है, लेकिन काम 12...
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 शिक्षामित्रों को मानदेय तो 11 महीने का मिलता है, लेकिन काम 12...
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कन्नौज। संवाददाता
 शिक्षामित्रों को मानदेय तो 11 महीने का मिलता है, लेकिन काम 12...
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कन्नौज। संवाददाता

शिक्षामित्रों को मानदेय तो 11 महीने का मिलता है, लेकिन काम 12 महीने का लिया जाता है। इन दिनों कई शिक्षामित्र कोविड-19 व स्वच्छता अभियान के लिए निगरानी समितियों की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। संगठन के पदाधिकारियों का कहना है कि वह एक महीने सरकार की बेगारी करते हैं। 

जनपद में 1439 शिक्षामित्र प्राथमिक स्कूलों में तैनात हैं। कोरोना संक्रमण काल की दूसरी लहर के दौरान तीन शिक्षामित्रों की मौत हो गई। इसमें ब्लॉक सौरिख, छिबरामऊ व उमर्दा के शिक्षामित्र शामिल हैं। अब इनके परिजनों ने सरकार से मुआवजा और नौकरी की मांग की है, लेकिन अब तक कोई ठोस आश्वासन नहीं मिला है। वर्तमान सरकार ने शिक्षामित्रों का मानदेय 10 हजार रुपए कर दिया है। पिछली सरकार में ज्यादातर शिक्षामित्रों को सहायक अध्यापक पद पर समायोजित हो गए थे। उनको 30 हजार के करीब वेतन मिलने लगा था। बाद में मामला कोर्ट में भी चला। उसके बाद सभी की मूल पद शिक्षामित्र पर ही वापसी हो गए। 

शिक्षामित्र यह करते ड्यूटी

शिक्षामित्रों का कहना है कि वह हर चुनाव में ड्यूटी करते हैं। बीएलओ की भी जिम्मेदारी निभाते हैं। बाल गणना, जनगणना, पल्स पोलियो अभियान, निगरानी समिति, स्वच्छता समिति आदि में जुड़कर काम करते हैं।

प्रदेश अध्यक्ष की भी सुनें

दूरस्थ बीटीसी शिक्षक संघ प्रदेश उपाध्यक्ष हृदयेश दुबे बताते हैं कि त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में करीब 50 फीसदी शिक्षामित्र लगे थे। तीन की मौत हो चुकी है। निगरानी समिति में ड्यूटी के अलावा अब ऑनलाइन शिक्षण कार्य भी दिया गया है। गांव में अस्वस्थ्य, बाहर से आए, कोविड-19 के लक्षण, कोरोना पॉजिटिव को अस्पताल भेजना और वैक्सीनेशन में सहयोग कर रहे हैं। 

इन शिक्षामित्र का भी दर्द सुने

आदर्श समायोजित शिक्षक संघ के जिला उपाध्यक्ष मोहम्मद परवेज का कहना हैकि जब-जब जरूरत पड़ी, तब-तब शिक्षामित्रों ने जून सरकार का सहयोग और काम किया है, लेकिन उस महीने का मानदेय कभी नहीं मिला है। हर सरकार से बराबर यही मांग रही है कि जितना काम हो, उतना दाम मिले, लेकिन सुनवाई हुई नहीं। निर्णय न होने से शिक्षामित्रों में मायूसी है। 

22 साल से कर रहे सेवा

शिक्षामित्रों का कहना है कि वर्ष 1999 में उनकी तैनाती का सिलसिला शुरू हुआ था। उसके बाद हर साल जून में कोई न कोई काम लिया जाता है, लेकिन उसका दाम कभी नहीं मिला। जून में सभी शिक्षामित्र बेरोजगार हो जाते हैं, लेकिन मानदेय नहीं मिलता। हृदयेश दुबे का कहना है कि वर्ष 2017 में सरकार ने वादा किया था कि समस्या का समाधान करेंगे, लेकिन साढ़े चार साल में सीएम ने इस पर एक शब्द भी नहीं बोला। 

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