
गैंगस्टर एक्ट और कमिश्नरेट प्रणाली पर हाईकोर्ट सख्त, अपर मुख्य सचिव गृह को कारण बताओ नोटिस जारी
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गैंगस्टर एक्ट लागू और कमिश्नरेट प्रणाली लागू करने के मामले में राज्य सरकार की ओर से संतोषजनक जानकारी नहीं देने पर नाराजगी जताई है। कोर्ट ने अपर मुख्य सचिव गृह को कारण बताओ नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण मांगा है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कमिश्नरेट प्रणाली लागू करने और गैंगस्टर के प्रावधानों को प्रभावी रूप से लागू करने के मामले में राज्य सरकार की ओर से संतोषजनक जानकारी नहीं देने पर नाराजगी जताई है। कोर्ट ने अपर मुख्य सचिव गृह को कारण बताओ नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण मांगा है कि किन कारणों से अदालत के बार बार के निर्देश के बावजूद वांछित जानकारी उपलब्ध नहीं कराई जा रही है। यह आदेश न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने राजेंद्र त्यागी व दो अन्य की याचिका की सुनवाई करते हुए दिया है।
इससे पूर्व कोर्ट ने गृह सचिव स्तर के अधिकारी से हलफनामे पर पूछा है कि ज़िले या कमिश्नरेट से इकट्ठा किया गया डाटा, जिसके आधार पर विभाग इस नतीजे पर पहुंचा है कि गैंगस्टर एक्ट के मामलों में काम करने वाला कमिश्नरेट सिस्टम, नियम 5(3)(ए) के तहत ज़रूरी संयुक्त बैठक से डीएम को बाहर रखना सही है या नहीं। यह राज्य व नागरिकों के हित में है, और उद्देश्य पूरा करता है या नहीं। जिन जिलों में कमिश्नरेट प्रणाली लागू की गई है, उन जिलों की तुलना में जहां कमिश्नरेट प्रणाली नहीं अपनाई गई है, वहां का डाटा तुलनात्मक अध्ययन का विवरण है और पुलिस अधिकारियों को दिए गए किसी भी प्रशिक्षण कार्यक्रम का विवरण, जिन्हें जिला मजिस्ट्रेटों द्वारा पूर्व में किए गए कार्यों का निर्वहन करने के लिए नियुक्त किया गया है, साथ ही राज्य सरकार के किसी भी अध्ययन का विवरण जो यह दर्शाता है कि गृह विभाग इच्छित उद्देश्य प्राप्त करने में सफल रहा है या नहीं।
कोर्ट ने जताई नाराजगी
कोर्ट ने पुलिस महानिदेशक (अभियोजन) को पिछले दस वर्षों के उत्तर प्रदेश गैंगस्टर व असामाजिक गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम के तहत मामलों के संबंध में व्यापक जिलावार डाटा पेश करने का भी निर्देश दिया था। कई तारीखों पर गृह विभाग की ओर से मांगी गई जानकारी संतोषजनक तरीके से उपलब्ध नहीं कराई जा सकी। इस पर नाराज़गी जताते हुए कोर्ट ने कहा कि गृह विभाग की ओर से दायर किए गए शपथपत्रों के अवलोकन से प्रथमदृष्टया यह प्रतीत होता है कि संबंधित अधिकारी/अधिकारियों ने या तो इस न्यायालय द्वारा पारित आदेशों पर समुचित ध्यान नहीं दिया है अथवा मामले को अत्यंत लापरवाहीपूर्ण ढंग से लिया है।
कोर्ट ने आगे कहा कि ऐसा लगता है कि यह दृष्टिकोण इस गलत धारणा पर आधारित है कि अधिसूचनाएँ जारी करने की शक्ति, जो कार्यपालिका में निहित है, का प्रयोग बिना समुचित विचार किए, असीमित विवेकाधिकार का सहारा लेकर तथा उसके परिणामों की जांच किए बिना किया जा सकता है। यद्यपि यह न्यायालय इस प्रकार के आचरण के पीछे निहित कारणों की गहराई में जाने से परहेज़ करता है, मगर यह मूक दर्शक बनकर नहीं रह सकता और राज्य के नागरिकों के हित में तथा न्यायिक प्रक्रिया की पवित्रता एवं प्राधिकार को बनाए रखने के लिए, अपने में निहित शक्तियों का प्रयोग करने से संकोच नहीं करेगा।
कोर्ट ने कहा कि यह न्यायालय इस तथ्य से भली-भांति अवगत है कि सबसे अधिक सद्भावनापूर्ण और ऊपर से अत्यंत श्रेष्ठ प्रतीत होने वाले विचार भी तब विफल हो सकते हैं, जब वे कमजोर प्रशासकों के हाथों में सौंप दिए जाते हैं-अर्थात् ऐसे प्रशासक जो अपर्याप्त रूप से प्रशिक्षित हों, संस्थागत दक्षता से वंचित हों, किंतु अत्यधिक महत्वाकांक्षी हों और जोड़-तोड़ में निपुण हों। कोर्ट ने अगली सुनवाई पर अपर मुख्य सचिव गृह को स्पष्टीकरण देने का निर्देश दिया है।





