हत्या के चश्मदीदों की गवाही पर हाईकोर्ट को संदेह, 42 साल पुराने हत्याकांड में उम्रकैद की सज़ा रद्द
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हत्या के करीब 42 साल पुराने मामले में दो आरोपियों को बड़ी राहत देते हुए उनकी उम्रकैद की सजा रद्द कर दी। कोर्ट ने कहा कि कथित चश्मदीद गवाहों के बयान और चिकित्सकीय साक्ष्य में गंभीर विरोधाभास है।

Allahabad Highcourt Order: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हत्या के करीब 42 साल पुराने मामले में दो आरोपियों को बड़ी राहत देते हुए उनकी उम्रकैद की सजा रद्द कर दी। कोर्ट ने कहा कि कथित चश्मदीद गवाहों के बयान और चिकित्सकीय साक्ष्य में गंभीर विरोधाभास है। गवाहों ने गोली और भाले से हमला किए जाने की बात कही, लेकिन मृतक के शरीर पर न तो गोली का घाव मिला और न ही भाले का कोई निशान।न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति वो विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने संत राम और रामलाल की आपराधिक अपील स्वीकार करते हुए शाहजहांपुर की विशेष अदालत द्वारा दो अगस्त 1984 को सुनाई गई उम्रकैद की सजा को निरस्त कर दिया।
अभियोजन के अनुसार 24 जनवरी 1984 की सुबह रामचंद्र अपनी चाय की दुकान पर जा रहा था। आरोप था कि संत राम, रामलाल सहित पांच लोगों ने उसका पीछा किया और पहले गोली चलाई। गोली लगने से रामचंद्र के गिरने के बाद आरोपियों ने उसे घेरकर चाकू और भालों से हमला किया। मामले में संत राम और रामलाल को हत्या का दोषी ठहराया गया था, जबकि तीन अन्य आरोपियों को संदेह का लाभ देकर बरी कर दिया गया था।
शरीर पर मिली थीं 25 चोटें मिलीं
हाईकोर्ट ने पाया कि प्रथम सूचना रिपोर्ट और कथित चश्मदीद दल्लू तथा नत्थू लाल ने गोली चलने और भाले से हमला होने की बात कही थी। दोनों ने बताया था कि रामचंद्र को गोली लगने के बाद आरोपी चाकू और भालों से उस पर हमला कर रहे थे। लेकिन पोस्टमार्टम में मृतक के शरीर पर 25 चोटें मिलीं, जिनमें 24 धारदार हथियार से लगी चोटें थीं। गोली या छर्रे का एक भी घाव नहीं मिला। भाले से लगी चोट भी नहीं पाई गई। कोर्ट ने कहा कि यदि गवाहों का बयान सही माना जाए तो मृतक के शरीर पर गोली और भाले की चोटें अवश्य मिलनी चाहिए थीं। चिकित्सकीय साक्ष्य से उनके बयान की पुष्टि नहीं होती। इससे यह गंभीर संदेह पैदा होता है कि दोनों वास्तव में घटना के समय मौके पर मौजूद थे या नहीं। अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि दल्लू की आंखों में मोतियाबिंद था और वह बिना चश्मे के स्पष्ट नहीं देख सकता था। घटना जनवरी की सुबह करीब सात बजे की थी। कोर्ट ने कहा कि सर्दी और संभावित कोहरे की स्थिति में करीब 20-22 कदम की दूरी से घटना को स्पष्ट रूप से देख पाने का उसका दावा भी संदेह पैदा करता है।
‘दुश्मनी दोधारी हथियार, अकेले इसके आधार पर दोषसिद्धि नहीं’
हाईकोर्ट ने कहा कि मृतक और संत राम के बीच पुरानी दुश्मनी जरूर थी, लेकिन सिर्फ दुश्मनी के आधार पर किसी व्यक्ति को हत्या का दोषी नहीं ठहराया जा सकता। दुश्मनी अपराध का मकसद हो सकती है, लेकिन झूठे फंसाने का कारण भी बन सकती है। संदेह कितना भी गंभीर क्यों न हो, वह प्रमाण का स्थान नहीं ले सकता। कोर्ट ने कहा कि जब अभियोजन की घटना की उत्पत्ति, घटनाक्रम और कथित चश्मदीदों की गवाही ही संदेहास्पद हो तथा चिकित्सकीय साक्ष्य उसका समर्थन न करता हो, तो दोषसिद्धि सुरक्षित रखना उचित नहीं है। अभियोजन आरोपी के खिलाफ अपराध को सभी उचित संदेहों से परे साबित करने में विफल रहा। हाईकोर्ट ने दोनों आरोपियों की अपील स्वीकार करते हुए 1984 की दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा रद्द कर दी।


