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अब शुरू करें मांगलिक कार्य

अब शुरू करें मांगलिक कार्य

राठ में देव उठनी एकादशी जिसे प्रबोधनी एकादशी (ग्यारस) भी कहा जाता है का बहुत अधिक महत्व बताया गया है। कहा जाता है कि इस दिन क्षीर सागर में विश्राम कर रहे विष्णु आदि देवता जाग्रत हो जाते हैं। इस एकादशी से विवाह आदि शुभ कार्य प्रारंभ हो जाते हैं। ग्यारस पर रात्रि में गन्ने की पूजा करने का प्रचलन है। किसान अपने खेतों में पहुंच विधि विधान से गन्ने की पूजा करता है, वहीं नगर में लोग बाजार से खरीद कर लाए गए गन्ने की पूजा कर अपने परिवार के लिए सुख सौभाग्य की कामना करते हैं।

धार्मिक मान्यता है कि अषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली एकादशी पर विष्णू आदि देवता शयन करने क्षीर सागर में चले जाते हैं। इस दिन से चार माह तक देवता शयन करते हैं जिन्हें चतुर्मास कहा जाता है। इन चार माह के समय में विवाह, मुंडन, नामकरण संस्कार आदि कोई भी मांगलिक कार्य वर्जित है। वहीं पूजा पाठ व ब्रत तप के लिए यह चार मास विशेष पुण्यदायक बताए गए हैं। इन चतुर्मास में सिर्फ पूजा, पाठ, तप, जप एवं दान के अनुष्ठान ही होते हैं। चार माह बीतने के बाद कार्तिक मास में शुक्ल पक्ष की ग्यारस के दिन देव उठनी ग्यारस अथवा प्रबोधनी एकादशी मनाई जाती है। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णू पाताल लोक से वापस आते हैं। इस दिन से विवाह आदि सभी मांगलिक कार्य पुन: प्रारम्भ हो जाते हैं। देव उठनी एकादशी को पाप विनाशिनी एवं मुक्ति देने वाली एकादशी के रूप में कहा गया है। इस दिन उपवास रख कर विधि विधान से पूजन करने पर हजारों अश्वमेघ यज्ञ के समान पुन्य प्राप्त होना बताया गया है। इस दिन तुलसी विवाह भी मनाया जाता है। कहा जाता है कि राक्षस जालंधर की पत्नी अत्यन्त पतिब्रता तथा भगवान विष्णु की भक्त थी। किन्तु जालंधर के पापों के कारण दुखी रहती थी। जालंधर का अत्याचार बढ़ने पर भगवान विष्णु ने उसका वध कर दिया। जिस पर उसकी पतिव्रता पत्नी ने भी सतीधर्म अपनाकर पति की चिता के साथ सती हो गई। जिसकी भस्म से तुलसी का पौधा उत्पन्न हुआ। तुलसी के सदगुणों के कारण ही भगवान विष्णू ने अगले जन्म में उनसे विवाह किया। इसी कारण प्रत्येक वर्ष भगवान शालिगराम व तुलसी का विवाह मनाया जाता है। देवउठनी एकादशी में पूजा के लिए गन्नों की जमकर खरीददारी हुई। साथ ही चने की भाजी, बेर, सिंघाडे़ आदि भी पूजन के लिए खरीदे गए। मांग बढ़ने के चलते गन्ने के रेट काफी ऊपर देखे गए।

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